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शनिवार, 14 सितंबर 2013

"मेरी हिन्दी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
इस पावन अवसर पर मेरी ग़ज़ल
 मेरी हिन्दी है कितनी सरल और सुगम,
सारे संसार में, इसका सानी नहीं।

बट (BUT) और (PUT) का नहीं भेद इसमें कहीं,
जोड़ और तोड़ की कुछ कहानी नहीं।

जैसा बोलो वही तुम लिखो और पढ़ो,
शब्द के अर्थ में, बे-ईमानी नहीं।

व्याकरण से भरा, पूर्ण विज्ञान है,
धाँधली की कहीं भी निशानी नहीं।

सन्धि नियमों में पूरी उतरती खरी,
मेरी माता की बोली, बिरानी नहीं।

4 टिप्‍पणियां:


  1. अच्छे उदगार व्यक्त किया हैं हिदी प्रेम दिवस पर।

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  2. "सारे संसार में इसका सानी नहीं!"

    उत्तर देंहटाएं
  3. नमस्कार आपकी यह रचना कल रविवार (15-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

    उत्तर देंहटाएं
  4. हिंदी के साथ-साथ एस्टिलो का जन्मदिन भी मुबारक हो...

    उत्तर देंहटाएं

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