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शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

"पर्वत की महिलाएँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पर्वत की महिलाएँ,
हँसिया लेकर जंगल जातीं।
पेड़ों से सूखी शाखाएँ,
काट-काटकर लातीं।।
कभी न मेहनत से घबड़ातीं,
नित्य-नियम से श्रम करती हैं।
अपने साथ समूचे घर का,
ये नारियाँ उदर भरती हैं।।

दुनियादारी के जंगल में,
चुनना होता पथ अपना है।
देती हैं सन्देश जगत को,
जीवन श्रम के लिए बना है।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना...
    आप की ये रचना आने वाले शनीवार यानी 21 सितंबर 2013 को ब्लौग प्रसारण पर लिंक की जा रही है...आप भी इस प्रसारण में सादर आमंत्रित है... आप इस प्रसारण में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...

    उजाले उनकी यादों के पर आना... इस ब्लौग पर आप हर रोज 2 रचनाएं पढेंगे... आप भी इस ब्लौग का अनुसरण करना।

    आप सब की कविताएं कविता मंच पर आमंत्रित है।
    हम आज भूल रहे हैं अपनी संस्कृति सभ्यता व अपना गौरवमयी इतिहास आप ही लिखिये हमारा अतीत के माध्यम से। ध्यान रहे रचना में किसी धर्म पर कटाक्ष नही होना चाहिये।
    इस के लिये आप को मात्रkuldeepsingpinku@gmail.com पर मिल भेजकर निमंत्रण लिंक प्राप्त करना है।



    मन का मंथन [मेरे विचारों का दर्पण]


    उत्तर देंहटाएं
  2. पर्वतीय प्रदेश की नारियों के श्रम को नमन !

    उत्तर देंहटाएं

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