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बुधवार, 11 सितंबर 2013

"दरवाजे की दस्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जीवन के कवि सम्मेलन में, गाना तो मजबूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।
जाने कितने स्वप्न संजोए,
जाने कितने रंग भरे।
ख्वाब अधूरे, हुए न पूरे,
ठाठ-बाट रह गये धरे।
सरदी-गरमी, धूप-छाँव को, पाना तो मजबूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।
जितना आगे कदम बढ़ाया,
मंजिल उतनी दूर हो गयीं।
समरसता की कल्पनाएँ सब,
थककर चकनाचूर हो गयीं।
घिसी-पिटी सी रीत निभाना, जन-जन की मजबूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।
बचपन बीता, गयी जवानी,
सूरज ढलने वाला है।
चिर यौवन को लिए हुए,
मन सबका ही मतवाला है।
दरवाजे की दस्तक को, पढ़ पाना बहुत जरूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. अनमोल कृति
    जीवन के हर रंग को
    बहुत ही बेहतरीन तरीक़े से बुन आपने सब्दों में सर
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह !
    जीवन का यही फलसफा है
    पर यहाँ पहुँचने के बाद ही
    कहने लगता है हर कोई
    ये सब होता होगा
    हमें कहाँ कुछ पता है !

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह प्रस्तुति 12-09-2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज बुलेटिन टीम के सबसे युवा ब्लॉग रिपोर्टर हर्षवर्धन जी का जन्मदिवस है , उन्हें अपना स्नेह और आशीष दीजिये साथ ही साथ पढिए उनके द्वारा तैयार की गई आज की ब्लॉग बुलेटिन ........
    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जन्मदिन और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें.
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन

    उत्तर देंहटाएं
  6. दरवाजे की दस्तक को, पढ़ पाना बहुत जरूरी है।
    आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है....बहुत खूब.

    उत्तर देंहटाएं
  7. आयें हैं तो कुछ कह सुन कर जाना बहुत जरूरी है। ब्लॉगर की तो यही कोशिश होती है सर।

    उत्तर देंहटाएं

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