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सोमवार, 23 सितंबर 2013

"कितनी अच्छी लगती हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चाँद और तारों की बातें,
मन के उद्गारों की बातें,
कितनी अच्छी लगती हैं!

उत्सव-त्यौहारों की बातें,
मोहक उपहारों की बातें,
कितनी अच्छी लगती हैं!

यौवन शृंगारों की बाते,
उन्नत बाज़ारों की बातें,
कितनी अच्छी लगती हैं!

अपने अधिकारों की बातें,
स्वप्निल संसारों की बातें,
कितनी अच्छी लगती हैं!

सुख के उजियारों की बातें,
भोले बंजारों की बातें,
कितनी अच्छी लगती हैं!

चहके परिवारों की बातें,
महके गलियारों की बातें,
कितनी अच्छी लगती हैं!

बढ़ते आधारों की बातें,
भरते भण्डारों की बातें,
कितनी अच्छी लगती हैं!

10 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुन्दर प्रस्तुति-
      आभार आदरणीय-

      हटाएं
  2. सच में कितनी अच्छी लगती हैं ये सारी बातें ।
    सुन्दर रचना आदरणीय शास्त्री जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. जितना अच्छा ये सब लगता है..
    उतनी ही अच्छी आपकी रचना भी लगती है...
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाकई ये सारी बातें सचमुच कितनी अच्छी लगती हैं ! मोहक रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आप का वहाँ हार्दिक स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बढ़िया रचना |
    क्या अच्छा लगता है या यूं कहें लग सकता है, का सुन्दर विश्लेषण |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं

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