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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

"जुल्म झोंपड़ी पर ढाया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सूरज चमका नीलगगन में, फिर भी अन्धकार छाया
धूल भरी है घर आँगन में, अन्धड़ है कैसा आया

वृक्ष स्वयं अपने फल खाते, सरिताएँ जल पीती हैं
भोली मीन फँसी कीचड़ में, मरती हैं ना जीती हैं
आपाधापी के युग में, जीवन का संकट गहराया

मौज मनाते बाज और भोली चिड़ियाएँ सहमी हैं
दहशतगर्दों की उपवन में, पसरी गहमा-गहमी हैं
साठ-गाँठ करके महलों ने, जुल्म झोंपड़ी पर ढाया

खून-पसीने से श्रमिकों की, फलते हैं उद्योग यहाँ
निर्धनता पर जीवन भारी, शिक्षा का उपयोग कहाँ
धनिक-बणिक धनवान हो गये, परिश्रमी धुनता काया

अन्धे-गूँगे-बहरों की, सत्ता-शासन में भरती है
लेकिन जनता लाचारी में, मँहगाई से मरती है
जो देता माया की झप्पी, उसको ही मिलती छाया

9 टिप्‍पणियां:

  1. काश कोई इन झोंपड़ियों में प्रेम पहुँचाये।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 27.09.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अन्धे-गूँगे-बहरों की, सत्ता-शासन में भरती है
    लेकिन जनता लाचारी में, मँहगाई से मरती है,,,

    बहुत सुंदर रचना !

    नई रचना : सुधि नहि आवत.( विरह गीत )

    उत्तर देंहटाएं
  5. दिल को छू जाने व वाली सुंदर संवेदाओं की प्रतुति
    prathamprayaas.blogspot.in-
    latest post आत्म साक्षात्कार -

    उत्तर देंहटाएं
  6. "जो देता माया की झप्पी, उसको ही मिलती छाया"

    उत्तर देंहटाएं

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