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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

"ग़ज़ल-तमन्नाओं की लहरे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हँसी भी है-खुशी भी है, तमन्नाओं की लहरे हैं
तभी नमकीन पानी में, बहुत से लोग ठहरे हैं

उमड़ती भावनाएँ जब, तभी तो ज्वार आता है
समन्दर की तलहटी में, पड़े माणिक सुनहरे हैं

कई सदियों से डूबी हैं, यहाँ गुस्ताख़ चट्टानें,
अभी इन कन्दराओं में, बसे असुरों के चेहरे हैं

मधुर जल से तुम्हें भरती, हमेशा पावनी गंगा
हुआ फिर नीर क्यों खारा, लगे क्यों आज पहरे हैं

बड़ी हसरत थी कोई तो, जुबां अपनी हिलायेगा
मगर इस जग के बाशिन्दे, तो गूँगे और बहरे हैं

लरजता “रूप” सरिता का, हुआ खामोश है अब तो
दिये हैं घाव जो दिल में, समन्दर से भी गहरे हैं

10 टिप्‍पणियां:

  1. कभी थे भाव उथले, किन्तु अब गम्भीर-गहरे हैं
    बहुत उम्दा !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया -
    सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही बड़ी बात कह दी आपने सर।
    सुन्दर और अनमोल,
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. बड़ी हसरत थी कोई तो, जुबां अपनी हिलायेगा
    मगर इस जग के बाशिन्दे, तो गूँगे और बहरे हैं
    बहुत खूब लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

    उत्तर देंहटाएं

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