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रविवार, 29 सितंबर 2013

"दर्पण काला-काला क्यों" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गुम हो गया उजाला क्यों?
दर्पण काला-काला क्यों?

चन्दा गुम है, सूरज सोया
काट रहे, जो हमने बोया
सूखी मंजुल माला क्यों?

राज-पाट सिंहासन पाया
सुख भोगा-आनन्द मनाया
फिर करता घोटाला क्यों

जब खाली भण्डार पड़े हैं
बारिश में क्यों अन्न सड़े हैं
गोदामों में ताला क्यों

कहाँ गयीं सोने की लड़ियाँ
पूछ रही हैं भोली चिड़ियाँ
तेल कान में डाला क्यों?

जनता सारी बोल रही है
न्याय-व्यवस्था डोल रही है
दाग़दार मतवाला क्यों

10 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर गीत-
    गंभीर प्रश्न -
    पर उत्तर कोई देना नहीं चाहता
    आभार गुरुवर-

    प्रश्नों के उत्तर सरल, पर रखते नहिं याद |
    स्वार्थ-सिद्ध के मामले, भोगवाद उन्माद |
    भोगवाद उन्माद , नशे से बहके बहके |
    लेते रहते स्वाद, अनैतिक चीजें गहके |
    नीति नियम आदर्श, हवा के ताजे झोंके |
    रविकर आये होश, लिखे उत्तर प्रश्नों के ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज के राजनीतिक प्रबंध को आईना दिखाती व्यंग्य विडंबना को मुखरित करती बेहतरीन रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छी व्यंगात्मक रचना गुरु जी प्रणाम
    आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [30.09.2013]
    चर्चामंच 1399 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

    उत्तर देंहटाएं
  5. वहह सुन्दर रचना वर्तमान परिवेश पर बढ़िया कटाक्ष..सदर नमन

    उत्तर देंहटाएं

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