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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

"स्वरावलि" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हिन्दी-स्वरावलि
‘‘‘’
‘‘‘’ से अल्पज्ञ सब, ओम् सर्वज्ञ है।
ओम् का जाप, सबसे बड़ा यज्ञ है।।
 --
‘‘’’
‘‘’’ से आदि न जिसका, कोई अन्त है।
सारी दुनिया का आराध्य, वह सन्त है।।
 --
‘‘’’
‘‘’’ से इमली खटाई भरी, खान है।
खट्टा होना खतरनाक, पहचान है।।
-- 
‘‘’’
‘‘’’ से ईश्वर का जिसको, सदा ध्यान है।
सबसे अच्छा वही, नेक इन्सान है।।
--
‘‘’’
उल्लू बन कर निशाचर, कहाना नही।
अपना उपनाम भी यह धराना नही।।
 --
‘‘’’
ऊँट का ऊँट बन, पग बढ़ाना नही।
ऊँट को पर्वतों पर, चढ़ाना नही।।
 --
‘‘’’
‘‘’’ से हैं वह ऋषि, जो सुधारे जगत।
अन्यथा जान लो, उसको ढोंगी भगत।।
-- 
‘‘’’
‘‘’’ से है एकता में, भला देश का।
एकता मन्त्र है, शान्त परिवेश का।।
 --
‘‘’’
‘‘’’ से तुम ऐंठना मत, किसी से कभी।
हिन्द के वासियों, मिल के रहना सभी।।
 --
‘‘’’
‘‘’’ से बुझती नही, प्यास है ओस से।
सारे धन शून्य है, एक सन्तोष से।।

‘‘’’
‘‘’’ से औरों को पथ, उन्नति का दिखा।
हो सके तो मनुजता, जगत को सिखा।।
-- 
‘‘अं’’
‘‘अं’’ से अन्याय सहना, महा पाप है।
राम का नाम जपना, बड़ा जाप है।।
-- 
‘‘अः’’
‘‘अः’’ के आगे का स्वर,अब बचा ही नही।
इसलिए आगे कुछ भी रचा ही नही।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना.वर्णमाला का सुंदर संकेत.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बढ़िया हिन्दी-स्वरावलि , आदरणीय धन्यवाद !
    आपकी इस रचना का लिंक कल यानी शनिवार दिनांक - 19 . 7 . 2014 को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

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