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शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

"सियासत में तिज़ारत है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जमाना है तिजारत का, तिज़ारत ही तिज़ारत है
तिज़ारत में सियासत है, सियासत में तिज़ारत है

नहीं अब वक़्त है, ईमानदारी का सचाई का
खनक को देखते ही, हो गया ईमान ग़ारत है

हुनर बाज़ार में बिकता, इल्म की बोलियाँ लगतीं
वजीरों का वतन है ये, दलालों का ही भारत है

प्रजा के तन्त्र में कोई, नहीं सुनता प्रजा की है
दिखाने को लिखी, मोटे हरफ में बस इबारत है

हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
खड़ी है खोखली बुनियाद पर, ऊँची इमारत है

लगा है घुन नशेमन में, फक़त अब रूप है बाकी
हमारी अंजुमन में तो, निग्हेंबानी नदारत है

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 05 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. अति यथार्थ की ऐसी रचनाएँ परिवर्तन ला सकती हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर रचना , आदरणीय धन्यवाद !
    आपकी इस रचना का लिंक शनिवार दिनांक - ५ . ७ . २०१४ को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर होगा , धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  5. हुनर बाज़ार में बिकता, इल्म की बोलियाँ लगतीं
    वजीरों का वतन है ये, दलालों का ही भारत है
    sach kaha aapne aaj to bharat ke yahi hal hain .very nice .thanks

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रजा के तन्त्र में कोई, नहीं सुनता प्रजा की है
    दिखाने को लिखी, मोटे हरफ में बस इबारत है
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं

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