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गुरुवार, 3 जुलाई 2014

"दोहे-जन-जीवन बेहाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

धरती प्यासी हो रहीजन-जीवन बेहाल।
धान लगाने के लिएलालायित गोपाल।१।
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सावन में सूखा पड़ानहीं बरसता नीर।
निर्धनश्रमिक-किसान कामन हो रहा अधीर।२।
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बादल के बदले खिली, आसमान में धूप।
ग्रीष्मकाल जैसा लगे, चौमासे का रूप।३।
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बढ़ी हुई मँहगाई से, जन-जीवन है त्रस्त।
अच्छा शासन देख कर, हुए हौसले पस्त।४।
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बिन ईंधन चलती वहीं, बाइक-मोटरकार।
अब तो मध्यम वर्ग को, खिसक रहा आधार।५।
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जनता से फिर हो गयी, भारी-भरकम भूल।
कौआ मोती निगलता, हंस फाँकता धूल।६।
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रामराज का स्वप्न अब, कैसे हो साकार।
जनता के हित की नहीं, सोच रही सरकार।७।
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चलकर आयी चाँदनी, क्यों करता है देर।
क्या कर लेंगे आपका, तीतर और बटेर।८।
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दिल पर अंकित हो गये, जीवन के अनुभाव।
अब तो शीतल लेप भी, बढ़ा रहे हैं घाव।९।
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कल तक थे अच्छे लगे, मीठे-मीठे बोल।
चार दिनों के बाद ही, खुली ढोल की पोल।१०।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना व प्रस्तुति , आदरणीय धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच में अवर्षा के कारण सभी परेशान हैं |उम्दा दोहे |

    उत्तर देंहटाएं

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