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शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

"खोलो तो मुख का वातायन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


वाणी से खिलता है उपवन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

शब्दों को मन में उपजाओ
फिर इनसे कुछ वाक्य बनो
सन्देशों से फलता गुलशन
स्वर व्यञ्जन ही तो है जीवन

स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
तुकबन्दी मादक-उन्मादी
बन्दी में होती आजादी 
सुख बरसाता रहता सावन 

स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
आता नहीं बुढ़ापा जिसको
तुकबन्दी कहते हैं उसको
छाया रहता जिस पर यौवन

स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
दुर्जन के प्रति भरा निरादर
महामान्य का करती आदर
तुकबन्दी से होता वन्दन

तुकबन्दी मनुहार-प्यार है
 यह महकता हुआ हार है
तुकबन्दी होती चन्दन-वन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

शायर की यह गीत–ग़ज़ल है
सरिताओं की यह कल-कल है
योगी-सन्यासी का आसन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

तुकबन्दी बिन जग है सूना
यही उदाहरण, यही नमूना
तुकबन्दी में है अपनापन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

तुकबन्दी बिन काव्य अधूरा
मज़ा नहीं मिलता है पूरा
तुकबन्दी से होता गायन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

अगर शान से जीना चाहो
तुकबन्दी को ही अपनाओ
खोलो तो मुख का वातायन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना बहुत पसंद आई।

    आपने तुकबंदी के ऊपर विचार रखे हैं मै उनके साथ हूं। परन्तु नम्र निवेदन भी करना चाहूँगा कि माननीय पंडित सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला जी ने कविता को नई दिशा प्रदान की और इसे पूर्णतः बन्धन से मुक्त भी कर दिया।
    आपकी कविता और सभी तरह की रचनाओं का मैं बहुत प्रशंसक हूँ। आदर सहित।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अगर शान से जीना चाहो
    तुकबन्दी को ही अपनाओ
    खोलो तो मुख का वातायन
    स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन........बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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