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रविवार, 27 जुलाई 2014

"चाय हमारे मन को भाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
 परदेशों से चलकर आई।
चाय हमारे मन को भाई।।

कैसे जुड़ा चाय से नाता,
मैं इसका इतिहास बताता,
शुरू-शुरू में इसकी प्याली,
गोरों ने थी मुफ्त पिलाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

जीवन का अंग ये बनी अब,
बड़े चाव से पीते हैं सब,
बिना चाय के फीकी लगती,
बिस्कुट-बर्फी और मलाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

बच्चों को नहीं दूध सुहाता,
चाय देख मन खुश हो जाता,
गर्म चाय की चुस्की लेकर,
बीच-बीच में मठरी खाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

इसके बिना अधूरा स्वागत,
नाखुश हो कर जाता आगत.
वशीभूत हम हुए चाय के, 
आदत में वो चाय समायी।
चाय हमारे मन को भाई।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. चाय की वास्तविकता उकेरे हुए सुदंर रचना।
    बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर रचना आदरणीय !
    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 28 . 7 . 2014 दिन सोमवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर रचना ! एवं मनोरंजक भी ,ऐसा कम ही कविताओं में देखने को मिलता है ! नहीं तो अधिकतर कवियों में एक अजीब सा विरोधाभास दीखता है .

    उत्तर देंहटाएं

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