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मंगलवार, 6 सितंबर 2016

दोहे "जय-जय गणपतिदेव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


विघ्नविनाशक आप हो, सभी गणों के ईश।
पूजा करते आपकी, सुर-नर और मुनीश।।
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सबसे पहले आपकी, पूजा होती देव।
सबकी रक्षा कीजिए, जय-जय गणपतिदेव।।
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करता है आराधना, मन से सकल समाज।
बिना आपके तो नहीं, होता मंगल काज।।
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दीपों के त्यौहार में, होता दिव्य निवेश।
घर में लाते हैं सभी, लक्ष्मी और गणेश।।
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पार्वतीनन्दन प्रभो, शिवजी के हो पूत।
नहीं आपकी दृष्टि में, कोई वृन्द अछूत।।
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शुक्ल चतुर्थी से शुरू, चतुर्दशी अवसान।
दस दिन रहता देश में, श्रद्धा का उन्मान।।
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सॉँझ-सवेरे आरती, उसके बाद प्रसाद।
होता है दरबार में, घण्टा-ध्वनि का नाद।।
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गणनायक भगवान की, महिमा बहुत अनन्त।
कृपा आपकी हो अगर, जीवन बने बसन्त।।
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मोदक हैं प्रिय आपको, गणनायक भगवान।
बनकर वाहन आपका, मूषक हुआ महान।।

1 टिप्पणी:

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