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रविवार, 18 सितंबर 2016

दोहे "हिन्दी की है हार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हिन्दी पर दुगनी पड़ी, महँगाई की मार।
जीवन के हर मोड़ पर, हिन्दी की है हार।।
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महानगर की रेल में, लिखा हुआ सन्देश।
महँगा है अब देश में, हिन्दी का परिवेश।।
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करते नौकरशाह हैं, हिंग्लिश से ही प्यार।
हिन्दी से सब कर रहे, सौतेला व्यवहार।।
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आये कोई भी यहाँ, दल-दल की सरकार।
हिन्दी का बेड़ा नहीं, कर पायेगी पार।।
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मन में अंग्रेजी भरी, मुख पर हिन्दी नाम।
हिन्दी में सरकार का, नहीं चल रहा काम।।
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मुखर हुआ है इण्डिया, भारत है अब मौन।
बात करेगा जगत में, हिन्दी की अब कौन।।
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कहनेभर को ही बचा, हिन्दी-हिन्दुस्तान।
अंग्रेजी परिवेश की, चलती खूब दुकान।।
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मास सितम्बर में करें, हिन्दी का गुणगान।
बाकी ग्यारह मास सब, सोते चादर तान।।
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गाँधी ने रक्खा सदा, हिन्दी से अनुराग।
मोदी हिन्दी का करो, रौशन यहाँ चिराग।।

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