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शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

गीत "कंचन सा रूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

विदा हुई बरसात, महीना अब असौज का आया।
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।
श्राद्ध गये, नवरात्र आ गये,
मंचन करते, पात्र भा गये,
रामचन्द्र की लीलाओं ने, सबका मन भरमाया। 
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।
विजयादशमी आने वाली,
दस्तक देने लगी दिवाली,
खेत और खलिहानों ने, कंचन सा रूप दिखाया।
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।
मूँगफली के होले भाये,
हरे सिंघाड़े बिकने आये,
नया-नया गुड़ खाने को, अब मेरा मन ललचाया।
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।

2 टिप्‍पणियां:

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