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सोमवार, 5 सितंबर 2016

दोहे "आदिदेव कर दीजिए बेड़ा भव से पार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
पार्वती-शिव पुत्र का, वन्दन शत्-शत् बार।
आदिदेव कर दीजिए, बेड़ा भव से पार।।
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भगवन मेरी भूल पर, मत हो जाना रुष्ट।।
मेरा मन है बावरा, कभी न हो सन्तुष्ट।।
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हों गणेश जी साथ जब, फिर कैसा सन्ताप।
सकल मनोरथ सिद्ध हों, जहाँ विराजो आप।।
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मेधा को दें शारदे, निर्मल करें चरित्र।
मेरा मन-मन्दिर करो, आकर आप पवित्र।।
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लक्ष्मी जी रहती वहाँ, होते जहाँ गणेश।
सरस्वती के वास से, पावन हो परिवेश।।
--
नदियों में जल की सदा, बहती निर्मल धार।
निर्मल मन-मस्तिष्क में, आते नवल विचार।।
--
हे गणनायक कीजिए, बस इतना उपकार।
मेरे छन्दों में करो, शब्दों का विस्तार।।
--
योजनाओं को मिल गया, अब नूतन प्रारूप।
सिद्धिविनायक आपसे, खिली रूप की धूप।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर. अंतिम दोहे में आप वाला स्वाभाविक प्रवाह दृष्टिगोचर नहीं हुआ .

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