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बुधवार, 28 सितंबर 2016

वन्दना के दोहे "भर देना लालित्य" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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नमन आपको शारदे, मन के हरो विकार।
नूतन छन्दों का मुझे, दो अभिनव उपहार।।
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तुक-लय-गति का है नहीं, मुझको कुछ भी ज्ञान।
मेधावी मुझको करो, मैं मूरख नादान।।
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सबसे पहले आपका, करता हूँ मैं ध्यान।
शब्दों को पहनाइए, कुछ निर्मल परिधान।।
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गीत-ग़ज़ल-दोहे लिखूँ, लिखूँ बाल साहित्य।
माता मेरे सृजन में, भर देना लालित्य।।
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लिखने वाली आप हो, मैं हूँ मात्र निमित्त।
पावन करना चित्त बस, नहीं चाहिए वित्त।।
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बैठक में अज्ञान की, पसरी हुई जमात।
विद्वानों को हाँकते, अब धनवान बलात।।
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देवी हो माँ ज्ञान की, ऐसे करो उपाय।
साधक वीणापाणि के, कभी न हों असहाय।।
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जगत गुरू बन जाय फिर, अपना प्यारा देश।।
वीणा की झंकार से, पावन हो परिवेश।।

4 टिप्‍पणियां:

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