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शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

दोहे "उड़तीं हुई पतंग-उत्तरायणी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मकर राशि में आ गये, अब सूरज भगवान।
नदिया में स्नान कर, करना रवि का ध्यान।‍१।
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उत्तरायणी पर्व को, ले आया नववर्ष।
तन-मन में सबके भरा, कितना नूतन हर्ष।२।
--
भारत में इस पर्व के, अलग-अलग हैं नाम।
“रूप” धूप का एक है, सुन्दर-सुखद-ललाम।३।
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चारों ओर भरा हुआ, लोगों में उल्लास।
सुधरेगा परिवेश अब, सबको यह विश्वास।४।
--
दिन-प्रतिदिन घट जायेगी, अब सर्दी की मार।
उपवन में आ जायेगा, नैसर्गिक सिंगार।५।
--
सरसों फूली खेत में, गेहूँ करते नृत्य।
अपने रीति-रिवाज से, हम सब करते कृत्य।६।
--
कलाबाजियाँ कर रहीं, उड़तीं हुई पतंग।
बिखराती आकाश में, भाँति-भाँति के रंग।७।
--
वसुन्धरा सजने लगी, भर सोलह सिंगार।
भारतमाता को करो, सच्चा-सच्चा प्यार।८।
--
तन को भी निर्मल करो, मन के हरो विकार।
गंगासागर दे रहा, पूजा का अधिकार।९।
--
अब भँवरे करने लगे, गुलशन में गुंजार।
कलियों में होने लगा, यौवन का संचार।१०।
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पीताम्बर को ओढ़कर, घूम रहा है सन्त।
बासन्ती परिवेश में, सजने लगा बसन्त।११।
--
शंकर जी भी चल दिये, मैदानों की ओर।
निर्मल हो मन्दाकिनी, कल-कल करती शोर।१२।
--
माता-पिता बुजुर्ग का, हरदम करना मान।
ज्ञानसिन्धु आचार्य का, करना मत अपमान।१३।
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नहीं बड़ा है देश से, भाषा-धर्म-प्रदेश।
भेद-भाव की भावना, पैदा करती क्लेश।‍‍१४।

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