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शनिवार, 28 जनवरी 2017

कविता "अब बसन्त आने वाला है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सेमल के इस महावृक्ष का,
पतझड़ में गदराया तन है।
पत्ते सारे सिमट गये हैं,
शाखाओं पर लदे सुमन हैं।।
 
टेसू के पेड़ों पर भी तो,
लाल अँगारे दहक रहे हैं।
अद्भुत् छटा वनों में फैली,
कुसुम डाल पर चहक रहे हैं।।
 
देते हैं सन्देश हमें यह,
अब बसन्त आने वाला है।
धूप गुनगुनी बोल रही है,
अब जाड़ा जाने वाला है।।
 
बासन्ती परिधान पहनकर
सरसों पीली फूल रही है।
गेंहूँ के कोमल बिरुओं पर,
हरी बालियाँ झूल रहीं हैं।।
 
प्रेमदिवस आने वाला है,
मस्त नज़ारों में खो जाएँ।
मौसम आमन्त्रण देता है,
खुश होकर हम नाचें-गाएँ।।



3 टिप्‍पणियां:

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