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सोमवार, 16 जनवरी 2017

ग़ज़ल "कड़ाके की सरदी में ठिठुरा बदन है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


शीतल धरा और शीतल गगन है
कड़ाके की सरदी में, ठिठुरा बदन है

उड़ाते हैं आँचल, हवा के झकोरे,
काँटों की गोदी में, पलता सुमन है

मिली गन्ध मधु की, चले आये भँवरे
मेरी बेबसी देख, हँसता चमन है

परेशान नदियाँ है, नालों के डर से.
करने को दूभर हुआ आचमन है

भरी “रूप” में आज कितनी मिलावट
झूठी खुशी दे रही अंजुमन है

1 टिप्पणी:

  1. वाह ... सर्दी के इस रूप को भी बाखूबी उतरा है शेरों में ...

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