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रविवार, 22 जनवरी 2017

गीत "रबड़-छन्द भाया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


छाँव वही धूप वही 
दुल्हिन का रूप वही 
उपवन मुस्काया है! 
नया-गीत आया है!! 

सुबह वही शाम वही 
श्याम और राम वही 
रबड़-छन्द भाया है! 
नया-गीत आया है!! 

बिम्ब नये व्यथा वही 
पात्र नये कथा वही  
माथा चकराया है! 
नया-गीत आया है!! 

महकी सुगन्ध वही 
माटी की गन्ध वही 
थाल नव सजाया है! 
नया-गीत आया है!! 

सूखा आषाढ़ है 
भादों में बाढ़ है 
कुहरा गहराया है! 
नया-गीत आया है!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर छन्द ... नया गीत ख़ुशियाँ लाया है

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर रचना
    हार्दिक बधाई!

    उत्तर देंहटाएं

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