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रविवार, 29 जनवरी 2017

कवित्त और मुक्तक "नेता आया बिनबुलाया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

भारत की महानता कानही है अतीत याद,
वोट माँगने कोनेता आया बिनबुलाया है।
देश का कहाँ है ध्यानहोता नित्य सुरापान,
जातिधर्मप्रान्त जैसेमुद्दों को भुनाया है।
युवराज-सन्त चल पड़ेगली-हाट में,
निर्वाचन के दौर नेये दिवस भी दिखाया है।।
--
दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सरज्यादा दाद मिला करती है।
सूखे पेड़ों पर बसन्त काकोई असर नही होता है,
यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।
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तुम्हारी याद को लेकरबड़ी ही दूर आये हैं।
लबों पर प्यास आयी तोतुम्हारे जाम पाये हैं।
छिपाकर अपनी आँखों में तुम्हारा नूर लाये हैं,
लिखाकर दिल की कोटर मेंतुम्हारा नाम लाये हैं।
--
आँखें कभी छला करती हैं,
आँखे कभी खला करती हैं।
गैरों को अपना कर लेती,
जब ये आँख मिला करती हैं।।
--
नेह का नीर पिलाकर देखो।
शोख कलियों को खिला कर देखो।
वेवजहा हाथ मिलाने से कुछ नहीं होगा-
दिल से दिल को तो मिलाकर देखो।।
--
अब तो हर बात बहुत दूर गई।
दिल की सौगात बहुत दूर गई।
रौशनी अब नज़र नहीं आती
चाँदनी रात बहुत दूर गई।।
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जीवन में तम को हरने को, चिंगारी आ जाती है।
घर को आलोकित करने को, बहुत जरूरी बाती है।
होली की ज्वाला हो चाहे, तम से भरी अमावस हो-
हवनकुण्ड में ज्वाला बन, बाती कर्तव्य निभाती है।
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हम दधिचि के वंशज हैं, ऋषियों की हम सन्ताने हैं।
मातृभूमि की शम्मा पर, आहुति देते परवाने हैं।
दुनियावालों भूल न करना, कायर हमें समझने की-
उग्रवाद-आतंकवाद से, डरते नहीं दीवाने हैं। 

1 टिप्पणी:

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