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बुधवार, 18 जनवरी 2017

गीत "कुदरत ने सिंगार सजाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बौराई गेहूँ की काया,
फिर से अपने खेत में।
सरसों ने पीताम्बर पाया,
फिर से अपने खेत में।।

हरे-भरे हैं खेत-बाग-वन,
पौधों पर छाया है यौवन,
झड़बेरी ने "रूप" दिखाया,
फिर से अपने खेत में।।

नये पात पेड़ों पर आये,
टेसू ने भी फूल खिलाये,
भँवरा गुन-गुन करता आया,
फिर से अपने खेत में।।

धानी-धानी सजी धरा है,
माटी का कण-कण निखरा है,
मोहक रूप बसन्ती छाया,
फिर से अपने खेत में।।

पर्वत कितना अमल-धवल है,
गंगा की धारा निर्मल है,
कुदरत ने सिंगार सजाया,
फिर से अपने खेत में।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. अपने खेत ही बात ही कुछ और है, एक अलग सुखानुभव
    बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19.1.17 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2582 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. अपने खेतों का सुंदर मनोहारी चित्रण, नजरों के समक्ष साकार कर दिया

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरती रचना।
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं

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