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गुरुवार, 26 जनवरी 2017

दोहे "करना राह तलाश" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जब तक प्राण शरीर में, सभी मनाते खैर।
धड़कन जब थम जाय तो, सब बन जाते गैर।।
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विधि के अटल विधान पर, चलता नहीं उपाय।
पंच तत्व की देह तो, माटी में मिल जाय।।
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कालचक्र को देखकर, होना मत भयभीत।
जो आया वो जायगा, जग की है यह रीत।।
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रहने काबिल जीव के, जब तक रहे शरीर।
 तब तक जीवन-नाव की, खुली रहे जंजीर।।
--
किसकी कितनी उमर है, नहीं किसी को ज्ञान।
चित्रगुप्त के गणित से, सब ही हैं अनजान।।
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कहीं शोक की धुन बजे, कहीं मांगलिक गीत।
पड़ती सबको झेलनी, गरमी-बारिश-शीत।।
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जीवन के संग्राम में, होना नहीं निराश।
मंजिल पाने के लिए, करना राह तलाश।।

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