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सोमवार, 3 अगस्त 2009

‘‘देवदत्त प्रसून की कलम से’’ प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’



छल की गागर छलकी रे।



छल की गागर छलकी रे।
हवा चली जहरीली,
हलकी-हलकी रे।।

कपट हाथ से विनाश ढपली,
बजा रही है तृणा पगली,
मिटा ‘आज’ को चिन्ता करती,
देखो कितनी ‘कलकी’ रे।
छल की गागर छलकी रे।।

अरे ततैया सुन्दर लगती,
नस में डसे तो आग सुलगती,
धोखा नजर न खाये देखो,
खबर रखो पल-पल की रे।
छल की गागर छलकी रे।।

उर के सारे भाव खोल कर,
मन के मोती सब टटोल कर,
भेद खोलतीं चुपके-चुपके,
नैन से बून्दें ढलकीं रे।
छल की गागर छलकी रे।।

‘रात’ रोशनी निगल चुकी है,
लिए कालिमा निकल चुकी है,
इन जलते-बुझते तारों की,
चमक दिखाती झलकी रे।
छल की गागर छलकी रे।।


11 टिप्‍पणियां:

  1. ‘रात’ रोशनी निगल चुकी है,
    लिए कालिमा निकल चुकी है,
    इन जलते-बुझते तारों की,
    चमक दिखाती झलकी रे।
    छल की गागर छलकी रे।।
    bahut achchhe bhav lage .badhai!

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर रचना. आभार आपका.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचना है बधाई स्वीकारें।

    जवाब देंहटाएं
  4. इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

    जवाब देंहटाएं

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