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सोमवार, 3 अगस्त 2009

‘‘खाज में कोढ़ के दाखले मत करो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


दूरिया कम करो फासले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

दौलतें बढ़ गईं दिल हुए तंग है,
कालिमा चढ़ गई, नूर बे-रंग है,
आग के ढेर पर घोंसले मत धरो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

मन में बैठे कुटिल पाप को कम करो,
बनके बादल सघन ताप को कम करो,
फूट और लूट के हौंसले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

वो ही दैरो-हरम में समाया हुआ,
नूर दुनिया में उसका ही छाया हुआ,
दीन-ईमान के चोंचले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

भाई-चारा निभाना सदा प्यार से,
रोग हरना सदा श्रेष्ठ उपचार से,
मखमली ख्वाब हैं खोखले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. भाई-चारा निभाना सदा प्यार से,
    रोग हरना सदा श्रेष्ठ उपचार से,

    शास्त्री जी बहुत ही बढिया भाव कविता का !

    जवाब देंहटाएं
  2. एक बेहद सुन्दर रचना शास्त्रीजी ! वधाई !!

    जवाब देंहटाएं
  3. मन में बैठे कुटिल पाप को कम करो,
    बनके बादल सघन ताप को कम करो,
    waah bahut khub,aaj ke samay mein bahut jaruri sandes hai.

    जवाब देंहटाएं
  4. दूरिया कम करो फासले मत करो।
    मखमली ख्वाब हैं खोखले मत करो।।
    Aaj aisi hi salahon par amal ka vakt hai.

    जवाब देंहटाएं
  5. सीख देती हुई बहुत ही सुन्दर रचना के लिये बधाई आभार्

    जवाब देंहटाएं
  6. दीन-ईमान के चोंचले मत करो।
    खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।
    ===
    बहुत सुन्दर कहा है. बेहतरीन रचना

    जवाब देंहटाएं
  7. atyant sateek, saamyik aur mauke ki baat !
    anand aaya..........
    is anupam kavita k liye badhaai !

    जवाब देंहटाएं
  8. भाई-चारा निभाना सदा प्यार से,
    रोग हरना सदा श्रेष्ठ उपचार से,

    bahut hi acche bhav..
    acchi rachna..
    badhai..

    जवाब देंहटाएं
  9. वो ही दैरो-हरम में समाया हुआ,
    नूर दुनिया में उसका ही छाया हुआ,
    दीन-ईमान के चोंचले मत करो।
    खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

    bahut hi acche bhav..

    जवाब देंहटाएं
  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  11. आदरणीय डॉ.शास्त्री साहब,

    जिवन के खूबसूरत फलसफे को दोहराता हुआ गीत बहुत सुन्दर और प्रेरक है, काश कि यह फलसफा हमारे दिलो-दिमाग में घर कर जाये:-

    वो ही दैरो-हरम में समाया हुआ,
    नूर दुनिया में उसका ही छाया हुआ,
    दीन-ईमान के चोंचले मत करो।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  12. kya kahne aapke.. Rishto ko kya bakhubi sameta hai... too good..!

    जवाब देंहटाएं
  13. दौलतें बढ़ गईं दिल हुए तंग है,
    कालिमा चढ़ गई, नूर बे-रंग है,
    आग के ढेर पर घोंसले मत धरो।
    खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

    IS KHOOBSOORAT GEET KE LIYE BADHAAYEE.

    जवाब देंहटाएं
  14. बेहद ख़ूबसूरत रचना जो बहुत अच्छी लगी!

    जवाब देंहटाएं
  15. bahut khoobsoorat bhavon se saji sanvri kavita.........sath hi prernadayi.

    जवाब देंहटाएं

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