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सोमवार, 17 अगस्त 2009

‘‘इस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आज का है पता और न कल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

हमने दुर्गम डगर पर बढ़ाये कदम,
हँसते-हँसते मिले, हर मुसीबत से हम,
हमको इन्सानियत के न छल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

हमने तूफान में रख दिया है दिया,
आँसुओं को सुधा सा समझकर पिया,
भव के सागर के कोई न तल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,
इस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

23 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत रचना! जीवन की सच्चाई को आपने शब्दों में बड़े बखूबी से पिरोया है! आखरी की चार पंक्तियाँ बेहद पसंद आया! बिल्कुल सही बात कहा है आपने! लाजवाब !

    जवाब देंहटाएं
  2. सुन्दर,
    सब गोलमाल ही लगता है इस कलयुग में !

    जवाब देंहटाएं
  3. बिल्कुल सही बात कहा है आपने! लाजवाब !सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  4. जीवन के saty को aasaani से लिख दिया है आपने............... lajawaab rachn है shaashtri जी आपकी..

    जवाब देंहटाएं
  5. गलती पर गलती करना ही आदत है हैवानों की...

    बहुत खूब डाक्टरसाब...नित्य ही छंदबद्ध रचना करना आपका जबर्दस्त अनुशासन है। आज के दौर में इन छंदों और इनमें निहित निति-सूत्रों को को पढ़ कर रोज ही खुद को धन्य मानता हूं।

    जवाब देंहटाएं
  6. "हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
    किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,
    इस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता।
    पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।"

    बिल्कुल सही कहा है आपने!
    अद्भुत रचना!

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही लाजवाब छंद हैं जी.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  8. इन्सानियत के न छल का पता।
    हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
    किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,
    bahut sundar panktiyaan

    जवाब देंहटाएं
  9. हमने दुर्गम डगर पर बढ़ाये कदम,
    हँसते-हँसते मिले, हर मुसीबत से हम,
    हमको इन्सानियत के न छल का पता।
    पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

    लाजवाब रचना!!!!

    जवाब देंहटाएं
  10. jeevan ke satya ko ujagar karti rachna.........halat bahut bigad gaye hain aur unhein aapne bakhubi prastut kiya hai........bigadte halat ka dard sahi ubhar kar aaya hai.........aur aakhiri ki char lines mein to satya se hi samna hota hai.

    जवाब देंहटाएं
  11. बेहद भावपूर्ण रचना.........और क्या कहे

    जवाब देंहटाएं
  12. आज का है पता और न कल का पता।
    पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

    just toooooo Goood.... badhai..!

    जवाब देंहटाएं
  13. शास्त्री जी गजब की कविता

    जवाब देंहटाएं
  14. व्यस्तता को बहुत रोचक अंदाज में परोसा है आपने.. हैपी ब्लॉगिंग

    जवाब देंहटाएं
  15. वाह...शास्त्री जी।
    कमाल की गज़ल लिखी है।
    मुबारकवाद!

    जवाब देंहटाएं
  16. आज का है पता और न कल का पता।
    पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

    मयंक जी।
    विषय के चयन में आपका जवाब नही।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  17. "हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
    किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,
    इस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता।
    पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।"
    बहुत बढ़िया लिखा है आपने।

    जवाब देंहटाएं
  18. हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
    किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,

    सुन्दर लाजवाब...

    जवाब देंहटाएं

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