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रविवार, 23 अगस्त 2009

‘‘बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

यदि अपने घर व्यंजन हैं, तो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा भी मिलनी मुश्किल, यदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़ वचन भी निर्धन का, जग को बचकाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

फूटी किस्मत हो तो, गम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों को बोरों की, कब पीड़ नजर आती है,
कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

धूप-छाँव जैसा, अच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह मास गुजर जाने पर, नया साल आता है,
खुशियाँ पा जाने पर ही अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है,। बहुत सुन्दर रचना, लाजवाब..............

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अनुपम गीत हैजी.........
    बाँच कर आनन्द आया..........
    प्रणाम !
    जय गणेश !

    जवाब देंहटाएं
  3. डाक्टर साहब जीवन का यह कटु सत्य है गीत के माध्यम से आपने जिसे अभिव्यक्त किया है । लेकिन यह गीत या कविता या आशा का संचार करने वाला साहित्य ही है जो बुरे वक्त में भी अच्छा लगता है ।

    जवाब देंहटाएं
  4. जीवन की सच्चाई को आपने बड़े ही सुंदर रूप से व्यक्त किया है! बहुत खूब!

    जवाब देंहटाएं
  5. शायद ये रचना मैने पहले भी पढी है सुन्दर अभिव्यक्ति है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  6. निर्मला बहिन जी!
    मैं तो नित नई रचना लिखता हूँ।
    आपने ये कहाँ से पढ़ ली होगी।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर रचना. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  8. डॉ. शास्त्री साहब,

    बहुत ही अच्छा गीत है, इस गीत में एक बंद मुझे किसी दर्शन शास्त्र के सिद्धाँत सा लगा :-

    कालीनों को बोरों की, कब पीड़ नजर आती है,
    कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।

    नमन!!!

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  9. धूप-छाँव जैसा, अच्छा और बुरा हाल आता है,
    बारह मास गुजर जाने पर, नया साल आता है,
    बहुत सुन्दर. जीवन के गहरे भाव.

    जवाब देंहटाएं

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