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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

“लहरों से जूझ रहे” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


काम तो हमारे हैं, नाम तो तुम्हारा है
पाँव तो हमारे हैं, रास्ता तुम्हारा है


लिख रहे हैं प्यार की इबारत को प्यार से
बोल तो हमारे हैं, कण्ठ तो तुम्हारा है


टूटी पतवार लिए, लहरों से जूझ रहे
दूर ही किनारा है, आपका सहारा है


दिल में झाँककर जरा, इक नज़र तो देखिए
आइना तुम्हारा है, अक्स तो हमारा है


दिख रहे हैं दोबदन, किन्तु एक है सुमन
"रूप" तो हमारा है, प्राण तो तुम्हारा है

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (10-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिख रहे हैं दोबदन, किन्तु एक है सुमन
    "रूप" तो हमारा है, प्राण तो तुम्हारा है

    दिख रहे हैं दोबदन, किन्तु एक है सुमन
    "रूप" तो हमारा है, प्राण तो तुम्हारा है

    अखिलेश भाई और उनके नेता (पिता जी )पे भी सटीक बैठतीं हैं ये पंक्तियाँ .बधाई बढ़िया संबोधन उद्बोधन के लिए .चर्चा मंच पर थोड़ी

    देर में पहुँच रहा हूँ .अब कनेक्टिविटी नार्मल हुई है .तीन दिन नए नए जुगाड़ करके .

    उत्तर देंहटाएं
  3. आइना तुम्हारा है, अक्स तो हमारा है--
    BAHUT SUNDAR KAVYA

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया संबोध- दिल में झाँककर जरा, इक नज़र तो देखिए
    आइना तुम्हारा है, अक्स तो हमारा है

    उत्तर देंहटाएं
  5. काम तो हमारे हैं, नाम तो तुम्हारा है
    पाँव तो हमारे हैं, रास्ता तुम्हारा है

    जेब बस तुम्हारी है ,माल सब हमारा है ,

    तंत्रप्रजा को बस आम जन का सहारा है .

    क्या बात है शास्त्री जी इस रचना के विविध आयाम हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर रचना....आभार !!

    उत्तर देंहटाएं

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