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रविवार, 4 नवंबर 2012

"इन्तज़ार-चित्रग़ज़ल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

22 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. "तुम बिन नही सुहाता कुछ भी इस असार संसार में"

    क्या बात कही है आपने ........सादर साभार !!!

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  3. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि आज दिनांक 05-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1054 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि आज दिनांक 05-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1054 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  5. बहुत भावपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति.आभार

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  6. शब्द उकेरे चित्र पर, रविकर के मन भाय ।

    झूठी शय्या स्वप्न की, वह नीचे गिर जाय ।।

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  7. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक कुछ कहना है पर है ।।

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  8. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल..
    ~सादर !

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  9. बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन गजल..
    उतना ही बेहतरीन प्रस्तुतीकरण...
    :-)

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  10. हम डूबे मंझन धार में..,

    झुलसी काया उलझे रे केश, भरी बसंत-बहार में..,

    हाय सुहाय न रुपको धुप, चाँद अगन लगाए है..,
    सूखे सूखे पल्लवित पुहुप शीतल-सुखद फुहार में.....,

    उत्तर देंहटाएं

  11. फिर फिर आवें सांझ सकारे , सखी जोहें बाट बहार में..,
    देखत पथ दो नैनन हारे, बावरे भए हम प्यार में.....

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 6/11/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है ।

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  13. इंतज़ार का अपना मज़ा है...बहुत खूब...

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  14. रुखा तन भुगते मन साजन उरझी सांस रे..,
    कैसे आएँ पास तुम्हारे हम डूबे मंझन धार में..,

    ना चिठिया ही ना संदेशा प्रबसे कौन बिदेश रे..,
    झुलसी काया उलझे रे केशा शरद भरी कोहार में.....

    उत्तर देंहटाएं
  15. सुंदर गज़ल विरह वेदना लिये ।

    उत्तर देंहटाएं

  16. फिर फिर आवें सांझ सकारे , सखी जोहें बाट बहार में..,
    पंथ निहारे दो नैनन हारे, बावरे भए हम प्यार में..,

    सपन-सलोने लोने लोने, सबहीं खोये गए हैं..,
    पीर सताए रहा न जाए बिनु तुम्हरे संसार में..,

    रुखा तन भुगते मन साजन उरझी सांस रे..,
    कैसे आएँ पास तुम्हारे हम डूबे मंझन धार में..,

    ना चिठिया ही ना संदेशा प्रबसे कौन परदेश रे..,
    झुलसी काया उलझे रे केशा शरद भरी निहार में.....

    हाय सुहाय न रुपको धुप, चाँद अगन लगाए है..,
    सूखे सूखे से पालउ पुहुप शीतल-सुखद फुहार में.....,

    उत्तर देंहटाएं

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