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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

"पहाड़ों के ढलानों पर-चित्रग़ज़ल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बनाये नीड़ हैं हमने, पहाड़ों के मचानों पर
उगाते फसल अपनी हम, पहाड़ों के ढलानों पर

मशीनों से नहीं हम हाथ से रोज़ी कमाते हैं
नहीं हम बेचते गल्ला, लुटेरों को दुकानों पर

बशर करते हैं अपनी ज़िन्दग़ी, दिन-रात श्रम करके
वतन के वास्ते हम जूझते, दुर्गम ठिकानों पर

हमारे दिल के टुकड़े, होटलों में माँजते बर्तन
बने दरबान कुछ लड़के, सियासत के मुकामों पर

पहाड़ी "रूप" की अपने, यही असली कहानी है
हमारी तो नहीं गिनती, चमन के पायदानों पर

16 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sundar aur marmsparshi prastuti yah parvtiy jivan ka kadva sach haiवह बड़े फख्र से कहतें हैं जब कारगिल हुआ हम विपक्ष में थे लेकिन हमने सत्ता पक्ष का साथ दिया .पूछे इनसे कोई क्या कारगिल बाजपेई जी का निजी मामला था .संकट में देश सदैव ही एक जूट हुआ है .इन बदनसीबों के लिए आकाश की भाषा का उसके स्पन्दन का कोई मतलब नहीं है .

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  2. बहुत सुंदर, जीवंत चित्रण शास्त्री सर !
    ~सादर !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. दुसह परिस्थिति देश की, प्राकृत है प्रतिकूल |
    भाईचारा प्रेम सत्य, है ईमान उसूल |
    है ईमान उसूल, भूल कर भी नहिं गन्दा |
    पर्वत अपना मूल, नेक प्रभु का यह बन्दा |
    बनता चौकीदार, देश की करे हिफाजत |
    लिए सुरक्षा भार, सभी लोगों को छाजत ||

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    उत्तर
    1. बशर करते हैं अपनी ज़िन्दग़ी, दिन-रात श्रम करके
      वतन के वास्ते हम जूझते, दुर्गम ठिकानों पर

      हमारे दिल के टुकड़े, होटलों में माँजते बर्तन
      बने दरबान कुछ लड़के, मुकामों पर

      पहाड़ी "रूप" की अपने, यही असली कहानी है
      हमारी तो नहीं गिनती, चमन के पायदानों पर
      pahaad ke dard aur gareebee ko rupaayit karti rachnaa

      हटाएं
  4. बशर करते हैं अपनी ज़िन्दग़ी, दिन-रात श्रम करके
    वतन के वास्ते हम जूझते, दुर्गम ठिकानों पर

    हमारे दिल के टुकड़े, होटलों में माँजते बर्तन
    बने दरबान कुछ लड़के, मुकामों पर

    पहाड़ी "रूप" की अपने, यही असली कहानी है
    हमारी तो नहीं गिनती, चमन के पायदानों पर
    pahaad ke dard aur gareebee ko rupaayit karti rachnaa

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह,,,बहुत खूब लिखा आपने,,,बधाई आपको

    पहाड़ी "रूप" की अपने, यही असली कहानी है
    हमारी तो नहीं गिनती, चमन के पायदानों पर,,,,,

    RECENT POST:..........सागर

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  6. मार्मिक सत्य अभिव्यक्त हुआ है। एक सर्वहारा ये भी हैं अपनी जमीन पर। बहुत बधाई और पढ़ाने के लिए आभार।

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  7. आपकी उम्दा पोस्ट बुधवार (07-11-12) को चर्चा मंच पर | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  8. ये पहाड़ों की देन ही है जो धरती को जीवन के योग्य बनाये है,और पर्वत-पुत्रों और पर्वतियों की महिमा, गीतों में भरी पड़ी है.

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  9. दुर्गम पहाडी जीवन का एक लाजबाब चित्रण शास्त्री जी !

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  10. bahut hee umdaa lekin picture pe likha hone ke kaaran padhne mein thodi asuvidha hui....

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  11. सुरेन्द्र मुल्हिद जी!
    चित्र के नीचे तो पूरी ग़ज़ल लिखी है मैंने इस पोस्ट में!

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  12. वाह वाह ...क्या बात है आपकी ये पोस्ट बेहद अच्छी लगी... क्या कहने :)

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत बहुत प्रभावित किया आपकी इस ग़ज़ल ने बड़ा सजीव जीवंत चित्रण किया है पहाड़ों पर श्रम करने वालों का बहुत सुन्दर हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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