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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

"बहुत देर से अहसास हुआ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ताकते-ताकते माहताब को शब ग़ुज़री है,
उसकी ज़ानिब़ से कोई हमको न पैग़ाम आया।
मेरी आँखों को बहुत देर से अहसास हुआ,
टकटकी बाँध के सूरज को झाँकते पाया।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी आँखों को बहुत देर से अहसास हुआ,
    टकटकी बाँध के सूरज को झाँकते पाया।।

    आज तो लाजवाब कर दिया ………शानदार

    उत्तर देंहटाएं
  2. इंतज़ार का नसीब ही ऐसा होता है...
    ~सादर !

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. इश्क पर जोर नहीं ,है ये वो आतिश ग़ालिब ,

    के लगाए न लगे और बुझाए न बने .

    बहुत बढ़िया आफताब करे है टाक झाँक माहताब का हुश्न .

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह 4 लाइनों में भी क्‍या बात है

    उत्तर देंहटाएं
  6. आ जाइये कि आपको तरसे है निगाह,
    देखा नही है हमने,बहुत दिन गुजर गए,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह !!!!
    एक पुराना शेर याद आ गया...

    मरने के बाद भी मेरी,आँखें खुली रहीं
    आदत पड़ी हुई है इन्हें,इंतजार की..

    उत्तर देंहटाएं
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