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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

"वह फरिश्ता कौन था?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

       बरेली जिले का एक पुराना कस्बा बहेड़ी है। जो खटीमा से 70 किमी दूर है। वहाँ पर फिल्म-जगत के मशहूर एक्टर दिलीप कुमार, पं. नारायण दत्त तिवारी के साथ आये हुए थे। उन दिनों मैं कांग्रेस पार्टी का एक सक्रिय कार्यकर्ता था। आदरणीय पं. नारायण दत्त तिवारी जी से हार्दिक लगाव होने के कारण मुझे उनके कार्यक्रम में जाना था। यह घटना आज से पन्द्रह वर्ष पुरानी है। 
        होटल बेस्ट व्यू , खटीमा के एम.डी. ठाकुर कमलाकान्त सिंह  मेरे अभिन्न मित्रों में थे। जो सिर्फ मेरी ही ड्राइविंग पर विश्वास करते थे इसलिए उनकी मारूति वैन को मैं ही चला रहा था। साथ में थे चेयरमैन डा.के.डी.पाण्डेय, हाजी रौनक हुसैन और ठा.कमलाकान्त सिंह। हँसी मजाक के साथ हमारा काफिला बहेड़ी की ओर बढ़ रहा था।
       सितारगंज कस्बे से 6 कि.मी. दूर सड़क के किनारे नया-गाँव पडता है। जहाँ पर 2-3 महीने पुरानी एक कच्ची कब्र बनी हुई थी और  रोड के किनारे कुछ ईंटें पड़ी हुई थी। ऐसा लगता था कि यहाँ किसी मजार का निर्माण होने वाला हो। शायद उसी के लिए ट्रक वाले दानस्वरूप कुछ पक्की ईंटे उतार जाते होंगे। 
         हमारी मारुतिवैनजैसे ही यहाँ पँहुची। हमारे साथ बैठे हुए ठाकुर साहब ने कार रुकवा दी और दस रुपये वहाँ रखी गोलक में डाल दिया। 
    ठाकुर कमलाकान्त सिंह हमारी ही राजनीतिक पार्टी के थे, इसलिए उनसे हम लोग हर तरह की बातें कर लेते थे। उनकी इस हरकत पर मैं हँसने लगा और उनकी खिंचाई करने लगा और उनके अन्धविश्वास पर कुछ अपशब्द इन मरहूम बाबा के बारे में भी बोल दिये।
       ठाकुर कमलाकान्त सिंह उम्रदार व्यक्ति थे। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा-
"शास्त्री जी चाहे भले ही आपकी यहाँ श्रद्धा न हो परन्तु मजाक उड़ाना ठीक नहीं होता है।"
            मैंने कहा- 
‘‘ठाकुर साहब! मैं यह सब नही मानता। हाँ एक बात है कि जब मेरी अपनी कार यहाँ खराब होगी। तब मैं भी इनको मानने लगूँगा।’’
अब तो यह मजार बनकर तैयार हो गई है।
 और बात यहीं खत्म हो गयी।
           दो-ढाई महीने बाद, मुझे अपने विद्यालय की जूनियर हाई स्कूल की मान्यता-सम्बन्धी फाइल जमा करने के लिए रुद्रपुर जाना पड़ गया। उस दिन 30 सितम्बर का दिन था। फाइल जमा करने की वह आखिरी तारीख थी।
मेरे पास उन दिनों डीजल की एम्बेसेडर कार थी और उसी से मैं रुद्रपुर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में फाइल जमा करने जा रहा था। 
        जैसे ही नया गाँव आया और मैं इस कच्ची मज़ार के सामने पहुँचा तो अचानक अच्छी चलती हुई कार ठीक मजार के सामने आकर ठप्प हो गयी। उसका कोई बोल्ट टूट गया था। इसलिए कार का एक पहिया मडगार्ड में टिक गया था। कहने का मतलब यह है कि कार बिल्कुल चलने की स्थिति मे नही थी।
        एक तो सितम्बर की गर्मी, ऊपर से कड़ी धूप। मेरी तो हालत खराब हो गयी थी। मन में तुरन्त 2-3 माह पूर्व की घटना याद आ गयी। अब मुझे बड़ा पश्चाताप हो रहा था कि मैंने उस दिन क्यों इस  कब्र में चिरनिद्रा में लीन ज़नाब अब्दुल हई की निर्माणाधीन मजार के ऊपर छींटाकसी की।
         अतःमैं निराश होकर वहाँ रोड के किनारे बनी पुलिया की रेलिंग पर बैठ कर पश्चाताप करने लगा और बाबा से माफी माँगने लगा। उस समय मैं इतना परेशान था कि एक हजार रुपये भी खर्च करने को तत्पर था और यह सोच ही रहा था कि काश कोई ट्रक मिल जाये जो मेरी कार को खटीमा या रुद्रपुर लाद कर ले जाये।
       तभी एक 24-पच्चीस साल का मरियल सा एक आँख से काना लड़का मेरी कार के दायें-बायें और उसके नीचे झुक कर देखने लगा।
        मैंने उसे बड़ी जोर से डाँटा तो वह पास आकर बोला- 
‘‘बाबू जी! मैं आपकी कार ठीक कर दूँगा।’’ 
       मैंने उससे कहा- 
‘‘भाग तो सही, यहाँ से। तूने अपनी सूरत देखी है। तू क्या कार ठीक करेगा? मैं ही तुझे ठीक कर देता हूँ।’’
      वह बड़ी विनम्रता से बोला- 
‘‘बाबू जी! आप तो बुरा मान गये। आप सच मानें, मैं आपकी कार ठीक कर दूँगा। मैं दिल्ली में एम्बसेडर की गैराज में काम करता हूँ।’’
अब तो मुझे अपने व्यवहार पर बहुत ग्लानि हुई।
     मैंने उससे कहा- 
‘‘तो ठीक करो।’’
     मेरे हामी भरने पर वह लड़का गाँव में एक ट्रैक्टर वाले से एक बोल्ट माँग कर लाया। जैक से गाड़ी उठाई और 15 मिनट में ही कार ठीक कर दी। मैंने उसे सौ रुपये ईनाम भी देना चाहा। परन्तु उसने लेने से मना कर दिया।
इसे क्या कहेंगे? चमत्कार, अन्धविश्वास या इत्तफाक।
     रुद्रपुर से लौट कर मैंने जब गाँव वालों से इस लड़के के बारे में पूछा तो गाँव वालों ने कहा- 
‘‘बाबू जी! इस गाँव में इस तरह का कोई लड़का है ही नही। न ही इस गाँव का कोई लड़का दिल्ली में किसी एम्बेसेडर की गैराज में काम करता है।"
          मुझे आज भी हैरानी है कि आखिर वह फरिश्ता कौन था?

13 टिप्‍पणियां:

  1. es kisse ko padh kar bs yahi kahugi ki ese kahate hai"prabhu aur uski kripa" jo ek adrishya sakti ke roop me sarv kalik evm sarv sthanik hai,yah shraddha ka vishy hai,atma aur hriday ki anubhuti hai,

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  2. बढ़िया संस्मरण |
    भली सीख ||
    आभार गुरुदेव ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. आखिर वह फरिश्ता कौन था?
    कई बार ऐसा हो जाता है ...

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  4. वो अपने आप को साबित कर देता है अब ये हम पर है हमने उसे जाना या नहीं।

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  5. किसी पर श्रद्धा हो या न हो परन्तु किसी का मजाक उड़ाना ठीक नहीं होता है।,,,,,
    "आपकी प्रार्थना को मजार वाले बाबा ने सुन ही ली,,,,,

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  6. दुआएं सब को देते हैं किसी से कुछ नही लेते ,
    खुदा का ख़ास इक इनाम हैं ये औलिया.
    आपने जो लिखा ये क्या है ? इसका जवाब वही है जब आपकी गाड़ी खराब हुई उस वक्त आपके ज़हन में आया था.

    मोहब्बत नामा
    मास्टर्स टेक टिप्स
    इंडियन ब्लोगर्स वर्ल्ड

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  7. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. छायांकन के साथ दोस्त भाषा शैली में भी निखार आया है वर्तनियाँ भी परिशुद्ध होतीं गईं हैं कालान्तर में हालाकि मूलतया आप छायाकार हैं फिर भी बस खड़ा .चढ़ा ,आदि के नीचे बिंदी और जड़ दिया

    करें .आपकी टिप्पणियाँ हमारे लेखन को भी अनुप्राणित करती हैं बिंदास लिखते हो दोस्त जाट की तरह सब कुछ पारदर्शी .शुक्रिया .

    जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी .

    आप सुनिश्चित हैं आपकी कार वाकई खराब हुई थी .कई बार यह घटनाएं मानसी सृष्टि भी होती हैं .और फिर विश्वास भी अफवाह की तरह संक्रामक चीज़ है फैलता है कही सुनी के आधार पर .

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  9. इसीलिए कहते हैं कि श्रद्धा के स्‍थान पर कभी अश्रद्धा नहीं जतानी चाहिए। ऐसे ही एक बार हमारे साथ भी हुआ था।

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  10. तभी तो अहसास होता है की भगवान भारत में ही बसते हैं...

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