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घुटन और सड़न में जिए जा रहे हैं,
जहर वेदना के पिये जा रहे हैं।
फकत नाम की है यहाँ राष्ट्र-भाषा,
चढ़ी है जुबाँ पर यहाँ आंग्ल-भाषा,
सभी काम इसमें किये जा रहे हैं।
चुनावों में हिन्दी ध्वजा गाड़ते हैं,
संसद में अंग्रेजियत झाड़ते हैं,
ये सन्ताप माँ को दिये जा रहे हैं।
जिह्वा कलम कर विदेशों में जाते,
ये हिन्दी को नीचा हमेशा दिखाते,
ये नौका भँवर में लिए जा रहे हैं।
भारत की जो जान, दिल और जिगर है
सन्तों की वाणी अमर है अजर है,
ये होठों को फिर भी, सिये जा रहें हैं।
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आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 19/09/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" पर.
जवाब देंहटाएंआप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा
हमेशा की तरह लाजवाब !
जवाब देंहटाएंजय हिंदी जय भारत !
जवाब देंहटाएंअपनों ने ही बिसराया है।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंdownloading sites के प्रीमियम अकाउंट के यूजर नाम और पासवर्ड
फकत नाम की है यहाँ राष्ट्र-भाषा......bilkul.....
जवाब देंहटाएंभारत की जो जान, दिल और जिगर है
जवाब देंहटाएंसन्तों की वाणी अमर है अजर है,
ये होठों को फिर भी, सिये जा रहें हैं।
रही जग में फिर भी सलामत ये हिंदी ,
ये तोहमत पे तोहमत दिए जा रहे हैं। बढ़िया प्रस्तुति हिंदी की वेदना लिए आहत संवेदना लिए।