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सोमवार, 8 नवंबर 2010

"....मेरा अन्तर नही मिलता है!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


अन्तर रखने वालों से, मेरा अन्तर नही मिलता है। 
जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।। 

जीवन कभी कठोर कठिन है, कभी सरल सा है, 
भोजन अमृत-तुल्य कभी है, कभी गरल सा है, 
माली बिना किसी उपवन में, फूल नही खिलता हैं। 
जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।। 

सावन मे भी कभी-कभी सूखा भी होता है, 
खाना खाकर कभी, उदर भूखा भी होता है, 
काँटे जिनकी करें सुरक्षा उनका तन नही छिलता है। 
जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।। 

नर्म-नर्म बिस्तर में, सुख की नींद नही आती है, 
किन्तु श्रमिक को कंकड़ की ढेरी पर आ जाती है, 
तप और श्रम से पत्थर का भी हृदय पिघलता है। 
जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।

27 टिप्‍पणियां:

  1. मयंक जी,
    अभिवंदन
    रचना पढ़ कर बहुत अच्छा लगा .
    वाह क्या लिखा है आपने ...अति सुन्दर.
    - विजय तिवारी 'किसलय'

    उत्तर देंहटाएं
  2. मयंक जी,
    अभिवंदन
    रचना पढ़ कर बहुत अच्छा लगा .
    वाह क्या लिखा है आपने ...अति सुन्दर.

    नर्म-नर्म बिस्तर में, सुख की नींद नही आती है, किन्तु श्रमिक को कंकड़ की ढेरी पर आ जाती है, तप और श्रम से पत्थर का भी हृदय पिघलता है। जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।

    - विजय तिवारी 'किसलय'

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. पहली पंक्ति में शायद "यमक" अलंकार का प्रयोग हुआ है. मुझे निश्चित पता नहीं. लेकिन एक अन्तर और दूसरे अन्तर के अन्तर ने आनन्द ला दिया..

    उत्तर देंहटाएं
  5. mayank ji,
    namaskar
    vastvikta ke dharatal ko sparsh karti aapki kavita bahut achhi lagi.prabhavi prastuti.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ....अंतर शब्द का प्रयोग बहुत अच्छा लगा ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. नर्म-नर्म बिस्तर में, सुख की नींद नही आती है,
    किन्तु श्रमिक को कंकड़ की ढेरी पर आ जाती है,
    तप और श्रम से पत्थर का भी हृदय पिघलता है।
    जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।

    संवेदनशील पंक्तियाँ.बहुत सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने .. अंतर्मन भी दो तरीके से .. और हर विरोधी परिस्थितयो पर पैनी नजर रखते हुवे कविता शानदार

    उत्तर देंहटाएं
  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 09-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  10. मेरे एक मित्र जो गैर सरकारी संगठनो में कार्यरत हैं के कहने पर एक नया ब्लॉग सुरु किया है जिसमें सामाजिक समस्याओं जैसे वेश्यावृत्ति , मानव तस्करी, बाल मजदूरी जैसे मुद्दों को उठाया जायेगा | आप लोगों का सहयोग और सुझाव अपेक्षित है |
    http://samajik2010.blogspot.com/2010/11/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं
  11. कांटे जिनकी करे सुरक्षा उनका तन नहीं हिलता है ...
    वाह ..
    मेहनतकश लोगों की बेफिक्र नींद ही इन्हें जिन्दा रखती है ...

    उत्तर देंहटाएं
  12. जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता ....satya vachan........bahut achchhi prastuti

    उत्तर देंहटाएं
  13. नर्म-नर्म बिस्तर में, सुख की नींद नही आती है,
    किन्तु श्रमिक को कंकड़ की ढेरी पर आ जाती है,
    तप और श्रम से पत्थर का भी हृदय पिघलता है।
    जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।

    बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  14. सावन मे भी कभी-कभी सूखा भी होता है,
    खाना खाकर कभी, उदर भूखा भी होता है,
    काँटे जिनकी करें सुरक्षा उनका तन नही छिलता है।

    बेजोड उम्दा प्रस्तुति……………बहुत ही अच्छी लगी ये रचना…………गज़ब का प्रयोग्।

    उत्तर देंहटाएं
  15. मयंक जी, जीवन के सार को कविता के रूप में आपने बहुत सुंदर ढंग से उतार दिया है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  16. सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  17. संदेशपूर्ण रचना . और अंतर का प्रयोग बहुत अच्छा लगा.

    उत्तर देंहटाएं
  18. साधारण जीवनों के असाधारणता के आयामों को व्याख्यायित करती खूबसूरत और भाव प्रवण रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  19. तप और श्रम, यही दो आवश्यक तत्व हैं जीवन में। सुन्दर कविता।

    उत्तर देंहटाएं

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