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सोमवार, 29 नवंबर 2010

"ग़ज़ल:आशा शैली" (प्रस्तोता:डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों!
आज भी बहन आशा शैली "हिमाचली"
की एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत कर रहा हूँ!
कल से फिर अपने रूप में आ जाऊँगा।

बात दिल की जहाँ-जहाँ रखिए
एक परदा भी दरम्याँ रखिए


घोंसले जब बुने हैं काँटों से
क्यों बचाकर हथेलियाँ रखिए


हौसले अपने आज़माने को
हर कदम साथ आँधियाँ रखिए


मौसमों से नज़र मिलाने को 
सर पे कोई न आसमाँ रखिए 


हर जगह नाम उनका लिक्खा है
फिक्र है दासतां कहाँ रखिए


माया-ए-ग़म छुपाएँ किस-किस से
कीमती शै को अब कहाँ रखिए


बात दिल की किसी से तो कहिए
पास बेहतर है राज़दाँ रखिए


तब जनम लेगी नग़मगी शैली
दिल के जख्मों पे जब ज़ुबां रखिए
आशा शैली "हिमाचली"
asha.shaili@gmail.com
---------

7 टिप्‍पणियां:

  1. बात दिल की जहाँ-जहाँ रखिए
    एक परदा भी दरम्याँ रखिए
    क्या जानदार बात कही है.
    बहुत बढ़िया.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आशा शैली जी की पिछली ग़ज़ल भी बेहतरीन थी... यह भी.. कुछ शेर तो अदभुद हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल के जख्मों पर जुबाँ रख देने से कितनी बातें सवँर जाती हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहद खूबसूरत …………शानदार गज़ल्।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बात दिल की किसी से तो कहिए
    पास बेहतर है राज़दाँ रखिए

    इन पंक्तियों ने बेहद प्रभावित किया....बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  6. शब्द नही है ........बहुत बहुत शुक्रिया
    सादर
    संध्या आर्य

    उत्तर देंहटाएं
  7. आशा शैली जी से मेरी पहली भेंट शिमला में हुयी थी , तब वे वहीँ की निवासिनी थी . १९९७ में हिमाचल प्रदेश सरकार ने मुझे बाल साहित्य पर वक्तव्य हेतु आमंत्रित किया था . उनकी रचनाएँ अद्भुत हैं . उनका स्वभाव भी अनुपमेय है .

    उत्तर देंहटाएं

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