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मंगलवार, 30 नवंबर 2010

"चरण-कमल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


हैं पूजनीय कोटि पद, धरा उन्हें निहारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

चरण-कमल वो धन्य हैं,
समाज को जो दें दिशा,
वे चाँद-तारे धन्य हैं,
हरें जो कालिमा निशा,
प्रसून ये महान हैं, प्रकृति है सँवारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

जो चल रहें हैं, रात-दिन,
वो चेतना के दूत है,
समाज जिनसे है टिका,
वे राष्ट्र के सपूत है,
विकास के ये दीप हैं, मही इन्हें दुलारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

जो राम का चरित लिखें,
वो राम के अनन्य हैं,
जो जानकी को शरण दें,
वो वाल्मीकि धन्य हैं,
ये वन्दनीय हैं सदा, उतारो इनकी आरती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा है आपने... मुझे इस बात से बड़ी तकलीफ होती है यदि कोई जन्म के आधार पर भेदभाव करता है. कोई भी.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बाऊ जी,
    नमस्ते!
    आपकी कविता अच्छी लगी. जन्म-जाति-धर्म के अधर पर भेदभाव नहीं होना चाहिए.
    इस सन्दर्भ में मेरे चिट्ठे पर प्रायश्चित पढ़ें. उम्मीद है आपको भायेगा.
    आशीष
    --
    नौकरी इज़ नौकरी!

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्षमा करें, अधर को आधार पढ़ा जाये.
    आशीष
    --
    नौकरी इज़ नौकरी!

    उत्तर देंहटाएं
  4. समाज को जो दें दिशा,
    वे चाँद-तारे धन्य हैं!

    wah wah wah!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. चरण-कमल वो धन्य हैं,
    समाज को जो दें दिशा,
    वे चाँद-तारे धन्य हैं,
    हरें जो कालिमा निशा

    बहुत सुन्दर गीत ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. हमेशा की तरह सुन्दर और लाजवाब रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर शब्द चित्रण्……………आज की समस्या को भी बखूबी चित्रित किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जो चल रहें हैं, रात-दिन,
    वो चेतना के दूत है,
    समाज जिनसे है टिका,
    वे राष्ट्र के सपूत है,
    विकास के ये दीप हैं, मही इन्हें दुलारती।
    सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।
    सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति!

    उत्तर देंहटाएं

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