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शनिवार, 27 नवंबर 2010

"माता के उपकार बहुत..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

माँ को नमन करते हुए!
आज यह बालकविता पोस्ट कर रहा हूँ!
  • माता के उपकार बहुत,
    वो भाषा हमें बताती है!
    उँगली पकड़ हमारी माता,
    चलना हमें सिखाती है!!

    दुनिया में अस्तित्व हमारा,
    माँ के ही तो कारण है,
    खुद गीले में सोकर,
    वो सूखे में हमें सुलाती है!
    उँगली पकड़ हमारी……..

    देश-काल चाहे जो भी हो,
    माँ ममता की मूरत है,
    धोकर वो मल-मूत्र हमारा,
    पावन हमें बनाती है!
    उँगली पकड़ हमारी……..

    पुत्र कुपुत्र भले हो जायें,
    होती नही कुमाता माँ,
    अपने हिस्से की रोटी,
    बेटों को सदा खिलाती है!
    उँगली पकड़ हमारी……..

    ऋण नही कभी चुका सकता,
    कोई भी जननी माता का,
    माँ का आदर करो सदा,
    यह रचना यही सिखाती है!
    उँगली पकड़ हमारी……
----------

15 टिप्‍पणियां:

  1. अपने हिस्से की रोटी, बेटों को सदा खिलाती है!
    उनके ऋण को कौन चुका सकता है। बहुत अच्छी और सच्ची पोस्ट।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मां-बाप के ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता.. सुन्दर शब्द...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचना ...माँ के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते ....

    लेकिन अपने हिस्से की रोटी केवल बेटों को ही खिलाती है ? बेटियाँ तो माँ का हृदय होती हैं ..उनको नहीं ?
    बेटों की जगह अगर बच्चों होता तो अच्छा लगता

    उत्तर देंहटाएं
  4. माँ को नमन करती हुई भावपूर्ण रचना -
    पहली गुरु है अपनी माता -
    प्रथम ज्ञान शिशु माँ से पाता-
    माँ को पुनः नमन -
    बधाई एवं शुभकामनाएं .

    उत्तर देंहटाएं
  5. सारगर्भित बाल-रचना! हम सब Grown-up लोग भी इससे प्रेरणा ले सकते हैं...माँ के उपकारों का संसार में कोई प्रतिदान नहीं हो सकता है...!

    हे माँ...तुझे प्रणाम!

    उत्तर देंहटाएं
  6. .

    माँ की ममता का सजीव चित्रण किया है आपने इस बेहतरीन रचना में ।
    आभार।

    .

    उत्तर देंहटाएं
  7. मातृ ॠण से कैसे मुक्त हो सकता है कोई………………एक बेहद उम्दा और सशक्त कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि कविराज श्री सतीश कुमार सक्सेना जी की कविता और उस पर डा. अनवर जमाल जी का कमेन्ट दोनों Comment pot में सुरक्षित कर लिए गए हैं .
    देखिये निम्न पोस्ट -
    जवानी दोबारा हासिल करने का बिलकुल आसान उपाय

    http://commentpot.blogspot.com/2010/11/best-comment-no-3.html

    उत्तर देंहटाएं
  9. माँ की ममता से बड़ा कोई ऋण नहीं है , जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता ...
    माँ की ममता को नमन!

    उत्तर देंहटाएं

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