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सोमवार, 22 नवंबर 2010

".. ...गीत गाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

वेदना की मेढ़ को पहचानते हैं। 
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

दुःख से नाता बहुत गहरा रहा,
मीत इनको हम स्वयं का मानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

हर उजाले से अन्धेरा है बंधा,
खाक दर-दर की नहीं हम छानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

शूल के ही साथ रहते फूल हैं,
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।

17 टिप्‍पणियां:

  1. विरह में गीत गाना... प्रेरणा से ओतप्रोत गीत ..

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  2. virah-vedna ke geet hi to asli geet hote hain!
    sangarsh bhare jeewan ka samadhan hai aapka geet .

    उत्तर देंहटाएं
  3. हर उजाले से अन्धेरा है बंधा,
    खाक दर-दर की नहीं हम छानते हैं।
    हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

    यही तो विरह वेदना होती है जो गीतों मे ढलती है…………वेदना का गहन चित्रण्।

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut sundar rachana.. virah par gaye geet se hee kavita kee pida ubharti hai.. aur akhiri panktiyaa bhi bemishaal...

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर उजाले से अन्धेरा है बंधा,

    कटु सत्य पर सत्य तो सत्य है
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. उत्साहित करती हुयी पंक्तियाँ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जो शूल को स्वीकार कर ले उसके लिए तो फिर फूल ही फूल हैं ...बहुत अच्छा गीत ..

    आपकी यह रचना कल के काव्य मंच पर है ..

    उत्तर देंहटाएं
  8. शूल के ही साथ रहते फूल हैं,
    बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं।
    सुन्दर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. विरह में गीत गाना ....वाह अच्छी रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  10. हम विरह में गीत गाना ....

    बहुत खूबसूरत गीत शास्त्री जी ..

    उत्तर देंहटाएं
  11. विरह में गीत गाना... कठिन समयों में भी उम्मीद का हाथ थाम निरंतर आगे बढ़ने को प्रेरित करती है. खूबसूरत प्रेरणादायक प्रस्तुति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  12. शूल के साथ ही रहते हैं फूल ...
    वैर काँटों से हम नहीं ठानते हैं ...
    हम विरह में गीत गाना जानते हैं ...
    सुन्दर गीत !

    उत्तर देंहटाएं
  13. "शूल के साथ रहते फूल हें -------हम विरह के गीत गाना जानते हें "
    सुंदर भाव लिरे रचना |बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं

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