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बुधवार, 14 दिसंबर 2011

"सर्दी ने है रंग जमाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

धूप धरा से आज खो गई।
दोपहरी में साँझ हो गई।।
शीत बदन को बहुत सताता।
बिन अलाव के रहा न जाता।।
काका ने तसला सुलगाया।
बुझी आग से मन भरमाया।।
दादा जी ने आग जलाई।
पोती आग सेंकने आई।।
माह दिसम्बर का अब आया।
सर्दी ने है रंग जमाया।।
ठिठुरन करती हाड़-कँपाई।
सड़कों पर वीरानी छाई।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. शस्त्री जी,..ठण्ड में बढ़िया अलाव जलाया...चित्रों के साथ सुंदर प्रस्तुति,....

    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी में
    घोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,
    मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली में
    रख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

    उत्तर देंहटाएं
  2. इतनी सुंदर कविता किन्तु "सर्दी ने है हाथ जमाया" इसलिए ज्यादा कुछ लिख नहीं प रहा...

    आजकल आप मेरे ब्लॉग पर नहीं आ रहे, कुछ गुस्ताखी हो गयी है क्या? या वो बात नहीं रही मेरी लेखनी मे!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर प्रस्तुति पर हमारी बधाई ||

    terahsatrah.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह ठंड बड़ी बढ़ती जाती,
    अँधियारा बन चढ़ती जाती।

    उत्तर देंहटाएं
  5. .चित्रों के साथ सुंदर प्रस्तुति,....

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस सुन्दर प्रस्तुति को देखकर टी वी पर आने वाले एक एड की याद आ गई ।
    बढ़िया लगा यह अंदाज़ भी ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. अहसास होने लगा है ठंड का.....
    सुंदर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत खूब , ठण्ड का अहसास करा दिया आपने.

    उत्तर देंहटाएं
  9. sardi ki thitharan ka achcha chitran kiya hai alaav ke chitra bahut sundar hain.

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-729:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं
  11. सुन्दर चित्रों के साथ सर्दी पर शानदार रचना लिखा है आपने!

    उत्तर देंहटाएं

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