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रविवार, 18 दिसंबर 2011

"सीख रहा हूँ दुनियादारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


सम्बन्धों के चक्रव्यूह में,
सीख रहा हूँ दुनियादारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

खुदगर्जी के महासिऩ्धु में,
कैसे सुथरा कहलाऊँगा?
पीने का पानी सागर से,
गागर में कैसे पाऊँगा?
बिना परिश्रम, बिना कर्म के,
क्या बन पाऊँगा अधिकारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

जीवन के झंझावातों से,
कदम-कदम पर लड़ना होगा।
बाधाओं को दूर हटाकर,
पथ पर आगे बढ़ना होगा।
जीवन का अस्तित्व बचाना,
मेरे जीवन की लाचारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

माँ ने जन्म दिया है मुझको
बापू ने चलना बतलाया।
जन्मभूमि ने मेरे मन में,
देशप्रेम का भाव जगाया।
अपने पथदर्शक गुरुओं का,
सदा रहूँगा मैं आभारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

27 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्री जी, बहुत सुंदर रचना ...बधाई ''''

    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी में
    घोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,
    मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली में
    रख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलिमे click करे

    उत्तर देंहटाएं
  2. aaj aapki kavitayen seedhe dil ko choo rahi hain aapko to abhi bahut lamba safar karna hai.bahut kuch abhi seekhna hai aapse.agli post koi khilkhilaati hui daaliye.
    is damdaar kavita ke liye badhaai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरे जीवन की लाचारी।
    जब पारंगत हो जाऊँगा,
    तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

    Shastri ji,
    bahut sundar rachana, sundar bhav,badhai sweekar karen.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप कवि बने रहें, संवेदना बची रहेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मानव का मानव से कैसा सुन्दर नाता है,
    ऐसे में रिश्तों का व्यापार कहाँ चल पाता है..
    बहुत सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  6. ह्रदय वेदना का वर्णन है
    उच्चारण शब्दों के भारी
    जीवन सरल, विचार गहन हों
    ना हो कहने मे लाचारी
    क्यों पारंगत होना है अब
    नहीं बनो तुम अब व्यापारी...
    मेरी भाषा मेरा अनुभव
    मैं हूँ सदा सदा आभारी....

    विजय

    उत्तर देंहटाएं
  7. सम्बंधों का चक्रव्यूह ना
    तोड़ सका है कभी अनाड़ी
    और न व्यापारी बन पाया,
    प्रेम नगर का प्रेम पुजारी.

    विसंगतियों का चक्रव्यूह और जीवन की लाचारी जो भी करा दे, कम है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप कभी व्यापारी नही बन सकते इतना संवेदनशील मन लेकर । सुंदर प्रस्तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. मेरे जीवन की लाचारी।
    जब पारंगत हो जाऊँगा,
    तब बन जाऊँगा व्यापारी।…………मानव मन की वेदना का सुन्दर व सटीक चित्रण किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जब पारंगत हो जाऊँगा,
    तब बन जाऊँगा व्यापारी।।
    बिल्कुल सही ,दुनियादारी सीखकर व्यापारी ही बना जा सकता है
    सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 19-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  12. दुनियादारी भी बहुत ज़रुरी है .. अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  13. दुनियादारी की अच्छी सीख

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत कुछ सीख देता हुआ सुंदर गीत।

    उत्तर देंहटाएं
  15. जब पारंगत हो जाऊँगा,
    तब बन जाऊँगा व्यापारी।।...badhiyaa

    उत्तर देंहटाएं
  16. सम्बन्धों के चक्रव्यूह में,
    सीख रहा हूँ दुनियादारी।

    सटीक बात की सुन्दर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  17. माँ ने जन्म दिया है मुझको
    बापू ने चलना बतलाया।
    जन्मभूमि ने मेरे मन में,
    देशप्रेम का भाव जगाया।
    अपने पथदर्शक गुरुओं का,
    सदा रहूँगा मैं आभारी।
    जब पारंगत हो जाऊँगा,
    तब बन जाऊँगा व्यापारी।।
    इस शानदार काव्यमय प्रस्तुति के लिए बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  18. जीवन के झंझावातों से,
    कदम-कदम पर लड़ना होगा।
    बाधाओं को दूर हटाकर,
    पथ पर आगे बढ़ना होगा।
    जीवन का अस्तित्व बचाना,
    मेरे जीवन की लाचारी।

    sundar prastuti ..

    उत्तर देंहटाएं
  19. जब पारंगत हो जाऊँगा,
    तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

    बहुत सुन्दर रचना है सर....
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं

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