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मंगलवार, 27 नवंबर 2012

"सुदामा भटक रहा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तन्त्र ये खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।

कंस हो गये कृष्ण आज,
मक्कारी से चल रहा काज,
भक्षक बन बैठे यहाँ बाज,
महिलाओं की लुट रही लाज,
तन्त्र ये खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।

जहाँ कमाई हो हराम की
लूट वहाँ है राम नाम की,
महफिल सजती सिर्फ जाम की
बोली लगती जहाँ चाम की,
तन्त्र ये खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।

जहरीली बह रही गन्ध है,
जनता की आवाज मन्द है,
कारा में सच्चाई बन्द है,
गीतों में अब नहीं छन्द है,
तन्त्र ये खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. महफिल सजती सिर्फ जाम की
    बोली लगती जहाँ चाम की,,,,

    भावमय सुंदर प्रस्तुति,,,,,

    resent post : तड़प,,,

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (28-11-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

    जवाब देंहटाएं
  3. जहाँ कमाई हो हराम की
    लूट वहाँ है राम नाम की,
    महफिल सजती सिर्फ जाम की
    बोली लगती जहाँ चाम की,
    तन्त्र ये खटक रहा है।
    सुदामा भटक रहा है।।

    लाजबाब !

    जवाब देंहटाएं
  4. सटीक...
    हम सब के मन में खटकता है
    आज क्यों सुदामा भटकता है ....???
    शुभकामनायें!

    जवाब देंहटाएं
  5. जहाँ कमाई हो हराम की
    लूट वहाँ है राम नाम की,
    महफिल सजती सिर्फ जाम की
    बोली लगती जहाँ चाम की,

    ....बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...आभार

    जवाब देंहटाएं
  6. गरीब सुदामा का कृष्ण एक न एक दिन अवश्य आयेगा..

    जवाब देंहटाएं
  7. कंस हो गये कृष्ण आज,
    मक्कारी से चल रहा काज,
    भक्षक बन बैठे यहाँ बाज,
    महिलाओं की लुट रही लाज,
    तन्त्र ये खटक रहा है।
    सुदामा भटक रहा है।।

    सच कहा आज की परिस्थिति का सटीक आकलन

    जवाब देंहटाएं
  8. तन्त्र ये खटक रहा है।
    -सबको खटक रहा है!

    जवाब देंहटाएं

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