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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

"इन्सानियत के न छल का पता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज का है पता और न कल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।


हमने दुर्गम डगर पर, बढ़ाये कदम,
हँसते-हँसते मिले, हर मुसीबत से हम,
हमको इन्सानियत के न छल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।


हमने तूफान में रख दिया है दिया,
आँसुओं को सुधा सा समझकर पिया,
भव के सागर के कोई न तल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।


हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,
किस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सटीक कहा, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. पता नहीं कुछ, जिये जा रहे,
    घँूट समय के पिये जा रहे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी यह बेहतरीन रचना कल दिनांक 12.07.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं

  6. हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
    किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,
    किस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता।
    पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

    bahut बहुत ऊंचे पाए की रचना है भाव और अर्थ सौन्दर्य लिए .ॐ शान्ति .शुक्रिया हमें चर्चा मंच में बिठाने के लिए .

    ॐ शान्ति

    उत्तर देंहटाएं

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