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सोमवार, 1 जुलाई 2013

"कैसे साथ चलोगे मेरे?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चारों ओर दुःख के घेरे।
कैसे साथ चलोगे मेरे?

पथ में कंटक-धूल भरी है,
खाई और गूल गहरी है,
निगल रहे हैं धूप अँधेरे।  
कैसे साथ चलोगे मेरे?

दूषित अपना गंगाजल है,
परिवेशों में घुला गरल है,
आज रश्मियों का अकाल है,
चादर ओढ़े पड़े सवेरे।
कैसे साथ चलोगे मेरे?

आँधी चलती पड़ते ओले,
तन पर रिसते घाव-फफोले,
फटा हुआ तम्बू है अपना,
आँसू टपकाते हैं डेरे।
कैसे साथ चलोगे मेरे?

अब तो अपनी ज़िद को छोड़ो,
मुझसे तुम मत नाता जोड़ो,
कदम-कदम पर रावण बैठे,
चौराहों पर खड़े लुटेरे।
कैसे साथ चलोगे मेरे? 

9 टिप्‍पणियां:

  1. लोगे मेरा वोट तुम, और चलोगे चाल |
    कस-मीरी के घर हुआ, पैदा पूत कमाल |
    पैदा पूत कमाल, लाल गायब था नौ दिन |
    थी आफत विकराल, चले राहत ना तुझ बिन |
    हे मेरे युवराज, अगर कल राजा होगे |
    खोज खबर किस तरह, रोम से आकर लोगे ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही कहा, बहुत मुश्किल है.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. दूषित अपना गंगाजल है,
    परिवेशों में घुला गरल है,
    आज रश्मियों का अकाल है,
    चादर ओढ़े पड़े सवेरे।
    कैसे साथ चलोगे मेरे?
    bahut sundar !

    उत्तर देंहटाएं
  6. .बहुत सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति आभार मुसलमान हिन्दू से कभी अलग नहीं #
    आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार८ /१ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं

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