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रविवार, 21 जुलाई 2013

"आया नये शहर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब गाँव का मुसाफिर, आया नये शहर में।
गुदड़ी में लाल-ओ-गौहर, लाया नये शहर में।

इज्जत का था दुपट्टा, आदर की थी चदरिया,
जिल्लत का दाग़ उसने, पाया नये शहर में।

चलती यहाँ फरेबी, हत्यायें और डकैती,
बस खौफ का ही आलम, छाया नये शहर में।

औरत के हुस्न थी, चारों तरफ नुमायस,
शैतानियत का देखा, साया नये शहर में।

इंसानियत यहाँ तो, देखी जलेबियों सी,
मिष्ठान झूठ का भी, खाया नये शहर में।

इससे हजार दर्जे, बेहतर था गाँव उसका,
फिर रूप याद उसको, आया नये शहर में।

7 टिप्‍पणियां:

  1. सांस्कृतिक शून्यता को गंभीरता से रेखांकित
    करती सुंदर रचना .....
    साभार....

    उत्तर देंहटाएं
  2. इंसानियत यहाँ तो, देखी जलेबियों सी,
    मिष्ठान झूठ का भी, खाया नये शहर में।
    ..बहुत सटीक

    उत्तर देंहटाएं

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