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शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

"अच्छी नहीं लगतीं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


वफा और प्यार की बातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं। 

तपन के बाद बरसातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं। 
मिलन होता जहाँ बिछड़ी हुई, कुछ आत्माओं का,  
चमकती वो हसीं रातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं।। 

गुलो-गुलशन की बरबादी, हमें अच्छी नहीं लगती।
वतन की बढ़ती आबादी, हमें अच्छी नहीं लगती। 
जुल्म का सामना करने को, जिसको ढाल माना था-
सितम करती वही खादी, हमें अच्छी नहीं लगती।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक मुक्तक-
    सार्थक सन्देश-
    आभार गुरु जी-

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर !
    'सपने देखती आँखें किसे अच्छी नहीं लगती...
    हक़ीक़त में झुलसी वीरानियाँ... हमें अच्छी नहीं लगती...'

    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह मयंक जी । बढ़िया मुक्तक हैं । आप तो हर विधा के उस्ताद लगते हैं । मेरी बधाई लें ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. गुलो-गुलशन की बरबादी, हमें अच्छी नहीं लगती।
    वतन की बढ़ती आबादी, हमें अच्छी नहीं लगती।
    जुल्म का सामना करने को, जिसको ढाल माना था-
    सितम करती वही खादी, हमें अच्छी नहीं लगती।।

    बहुत अच्छे !क्या बात !

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत बढिया..सुन्दर पंक्तियाँ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. वफा और प्यार की बातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं।
    तपन के बाद बरसातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं। .....
    .....
    जुल्म का सामना करने को, जिसको ढाल माना था-
    सितम करती वही खादी, हमें अच्छी नहीं लगती।।
    ...
    बहुत अच्छी/सच्ची पंक्तिया हैं, बधाई!

    उत्तर देंहटाएं

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