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बुधवार, 24 जुलाई 2013

"कैसे उलझन को सुलझाऊँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

किस पथ पर मैं कदम बढ़ाऊँ
जिससे मंजिल को पा जाऊँ

दोराहे मन को भटकाते
मुझको अपनी ओर बुलाते
कैसे उलझन को सुलझाऊँ
जिससे मंजिल को पा जाऊँ

किसी डगर में नहीं फूल हैं
दोनों में भरपूर शूल हैं
दुविधा है किसको अपनाऊँ
जिससे मंजिल को पा जाऊँ

मीठी वाणी बोल रहे हैं
मेरा सुमन टटोल रहे हैं
संगी-साथी किसे बनाऊँ
जिससे मंजिल को पा जाऊँ

लील गयी है चाँद अमावस
लाऊँ कहाँ से उजली पावस
नाथ आपको कैसे पाऊँ 
जिससे मंजिल को पा जाऊँ

16 टिप्‍पणियां:

  1. किसी डगर में नहीं फूल हैं
    दोनों में भरपूर शूल हैं
    दुविधा है किसको अपनाऊँ
    जिससे मंजिल को पा जाऊँ

    bahut sunder

    उत्तर देंहटाएं
  2. किसी डगर में नहीं फूल हैं
    दोनों में भरपूर शूल हैं
    दुविधा है किसको अपनाऊँ
    जिससे मंजिल को पा जाऊँ...बहुत खुबसूरत छन्दबन्ध..

    उत्तर देंहटाएं
  3. दुनियां दो मुँहीं है शाश्त्री जी. सुंदर छंद.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25/07/2013 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

  5. ापने लिखा... हमने पढ़ा... और भी पढ़ें...इस लिये आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 26-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



    जय हिंद जय भारत...


    मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...


    उत्तर देंहटाएं
  6. मन की उलझनों का सुन्दर चित्रण, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  7. किसी डगर में नहीं फूल हैं
    दोनों में भरपूर शूल हैं
    दुविधा है किसको अपनाऊँ
    जिससे मंजिल को पा जाऊँ......bakhubi chitran kiya hai duvidhagrast mn ka lajavab ....

    उत्तर देंहटाएं
  8. राहों का यही द्वंद्व विचलित करता है, रास्ता इतनी आसानी से मिलता कहाँ है !

    उत्तर देंहटाएं
  9. भावना में पगे मानसिक द्वंद की अनूठी अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. मन के द्वंद को शब्दों में उतारा है ... मधुर गीत बन के मन में समाता है ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. लील गयी है चाँद अमावस
    लाऊँ कहाँ से उजली पावस
    नाथ आपको कैसे पाऊँ
    जिससे मंजिल को पा जाऊँ....बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं

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