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मंगलवार, 30 जुलाई 2013

"जाम ढलने लगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

करते-करते भजन, स्वार्थ छलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। 

 
झूमती घाटियों में, हवा बे-रहम
घूमती वादियों में, हया  बे-शरम
शीत में है तपन, हिम पिघलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  


उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे
फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे
गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  


हो रहा सब जगहधन से धन का मिलन
रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन,  
नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।  
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। 

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर जाम हैं
    दिखते जरूर आम हैं
    खास जाम होते हैं जो
    दिखते कहाँ सरे आम हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया...
    प्रश्न चिन्ह खड़े करती रचना.

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी रचना कल बुधवार [31-07-2013] को
    ब्लॉग प्रसारण पर
    हमने जाना
    आप भी जानें
    सादर
    सरिता भाटिया

    उत्तर देंहटाएं
  4. नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।

    सही कहा आपने.....

    उत्तर देंहटाएं

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