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रविवार, 28 जुलाई 2013

"अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
धूल भरी क्यों आज गगन में
क्यों है अँधियारा उपवन में?

 सूरज क्यों दिन में शर्माया
भरी दुपहरी में क्यों छाया

चन्दा गुम क्यों बिना अमावस
नजर नही आती क्यों पावस

क्यों है धरती रूखी-रूखी
क्यों है खेती सूखी-सूखी

छागल क्यों हो गई विदेशी
पागल क्यों है आज स्वदेशी

कहाँ गयी माता की बिन्दी
सिसक रही क्यों अपनी हिन्दी

प्यारी भाषा बहक रही क्यों
अंग्रेजी ही चहक रही क्यों

कहने भर की आजादी है! 
आज वतन की बर्बादी है!! 

नजर न आता कहीं अमन है! 
दागदार हो गया चमन है!! 

कहाँ हो गई चूक भयंकर
विष उडेलते हैं क्यों शंकर

रक्षक जब उत्पात मचाये! 
विपदाओं से कौन बचाये

आस लगाये यशोदा मइया! 
अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया!!

9 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया आवाहन गीत -
    पर मुश्किलें इतनी ज्यादा है की अकेले कृष्ण भी क्या कर पायेंगे --
    आभार गुरु जी-

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर आह्वान ... कान्हा के नाम ...
    उनका ही सहारा बाकी है अब लगता है .... नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर आह्वाहन ! वाकई कन्हैया तुम्हारी जरूरत है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सारे प्रश्न और समाधान भगवान के पास ही है
    सादर आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  5. अब एक कृष्ण को आना ही होगा !

    उत्तर देंहटाएं

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