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बुधवार, 31 जुलाई 2013

"हमें फुरसत नहीं मिलती" (ड़ॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नज़ारों में भरा ग़म है, बहारों में नहीं दम है,
फिजाएँ भी बहुत नम हैं, सितारों में भरा तम है
हसीं दुनिया बनाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं आभास रिश्तों का, नहीं एहसास नातों का
किसी को आदमी की है, नहीं विश्वास बातों का
बसेरे को बसाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

लुभाती गाँव की गोरी, सिसकता प्यार भगिनी का
सुहाती अब नहीं लोरी, मिटा उपकार जननी का
सरल उपहार पाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं गुणवान बनने की, ललक धनवान बनने की
बुजुर्गों की हिदायत को, जरूरत क्या समझने की
वतन में अमन लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

भटककर जी रही दुनिया, सिमटकर जी रही दुनिया
सभी को चाहिएँ बेटे, सिसककर जी रही मुनिया
चहक ग़ुलशन में लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ, फुरसत तो निकालनी ही पड़ेगी, हम सबको।

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक एक पंक्ति-दमदार-
    शुभकामनायें गुरु जी-

    उत्तर देंहटाएं
  3. भटककर जी रही दुनिया, सिमटकर जी रही दुनिया
    सभी को चाहिएँ बेटे, सिसककर जी रही मुनिया
    बहुत सुन्दर कविता ....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ........ बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  5. भटककर जी रही दुनिया, सिमटकर जी रही दुनिया
    सभी को चाहिएँ बेटे, सिसककर जी रही मुनिया
    चहक ग़ुलशन में लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती

    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01/08/2013 को चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  7. उत्‍कृष्‍ट रचना। गूगल रीडर बन्‍द होने के कारण ब्‍लाग पढ़ने में कठिनाई आ रही है, इस समस्‍या का निदान क्‍या है?

    उत्तर देंहटाएं
  8. भटककर जी रही दुनिया, सिमटकर जी रही दुनिया
    सभी को चाहिएँ बेटे, सिसककर जी रही मुनिया
    ...बहुत सही कहा आपने .....आज भी मुन्ना चाहिए मुनिया नहीं, यह मानसिकता कम नहीं हुए है ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 02.08.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं

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